एआई
और कॉपीराइट कानून: भारत में कानूनी समीक्षा की आवश्यकता और दिशा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने दुनिया भर
में तकनीक और कानून दोनों
के क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव
लाए हैं। लेकिन जैसे-जैसे AI मॉडल व्यापक रूप
से प्रशिक्षण के लिए इंटरनेट
पर मौजूद सामग्री का उपयोग कर
रहे हैं, कॉपीराइट उल्लंघन
का मुद्दा भी तेजी से
उभरकर सामने आया है। भारत
सरकार ने हाल ही
में एक पैनल गठित
किया है जो मौजूदा
कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की समीक्षा करेगा
और यह देखेगा कि
यह अधिनियम वर्तमान एआई प्रौद्योगिकियों की
जटिलताओं से कैसे निपट
सकता है।
AI मॉडल, विशेषकर जनरेटिव AI (जैसे कि ChatGPT), को
प्रशिक्षित करने के लिए
विशाल मात्रा में डेटा की
आवश्यकता होती है। यह
डेटा अक्सर इंटरनेट से "स्क्रैप" किया जाता है—जिसमें समाचार, लेख, साहित्य, चित्र
और अन्य रचनात्मक सामग्री
शामिल होती है। इनमें
से अधिकतर सामग्री कॉपीराइट द्वारा संरक्षित होती है। सवाल
यह उठता है कि
क्या इस तरह की
कॉपीराइट युक्त सामग्री का AI मॉडल को ट्रेन
करने के लिए उपयोग
करना कॉपीराइट उल्लंघन माना जाएगा?
AI मॉडल, विशेष रूप से जनरेटिव AI जैसे कि ChatGPT, DALL·E, और अन्य बड़े भाषा मॉडल (LLMs), को प्रशिक्षित करने के लिए अत्यधिक मात्रा में डेटा की आवश्यकता होती है। यह डेटा अक्सर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध इंटरनेट संसाधनों से स्वचालित तरीकों से एकत्रित किया जाता है, जिसे सामान्य भाषा में "वेब स्क्रैपिंग" कहा जाता है। इस स्क्रैप किए गए डेटा में समाचार लेख, साहित्यिक रचनाएँ, अकादमिक प्रकाशन, चित्र, फिल्म स्क्रिप्ट और सोशल मीडिया पोस्ट तक शामिल होते हैं।
इनमें से अधिकतर सामग्री कॉपीराइट कानून के अंतर्गत संरक्षित होती है, जिसका अर्थ है कि इनका उपयोग, पुनरुत्पादन या व्यावसायिक लाभ के लिए दोबारा प्रयोग बिना अनुमति अवैध हो सकता है। यही वह बिंदु है जहां AI प्रशिक्षण और कॉपीराइट के बीच कानूनी टकराव उत्पन्न होता है।
मुख्य
कानूनी प्रश्न यह है कि
क्या किसी कॉपीराइट युक्त
सामग्री का केवल प्रशिक्षण
उद्देश्य से उपयोग करना
"उल्लंघन" की श्रेणी में
आता है? यानी, जब
कोई AI मॉडल किसी रचना
को सीधे दोहराता नहीं
है, लेकिन उससे "सीखता" है, तो क्या
यह कॉपीराइट का हनन माना
जाएगा?
भारत
के मौजूदा कानूनों में इस स्थिति को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। कॉपीराइट अधिनियम, 1957 अभी तक ऐसी
मशीन-जनित प्रक्रियाओं को
न तो अनुमति देता
है, न ही प्रतिबंधित
करता है। धारा 52 में
“उचित उपयोग” (Fair Dealing) की छूट दी
गई है, लेकिन इसमें
AI प्रशिक्षण जैसी उभरती तकनीकों
के लिए विशेष उल्लेख
नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर भी यह मुद्दा कानूनी रूप से विवादास्पद है। उदाहरण के लिए, अमेरिका
में OpenAI और Meta जैसी कंपनियों के
खिलाफ लेखकों और कलाकारों ने
मुकदमे दायर किए हैं,
जिनमें दावा किया गया
है कि उनकी रचनाओं
का उपयोग एआई मॉडल प्रशिक्षण
के लिए बिना अनुमति
किया गया।
इस परिप्रेक्ष्य में भारत में चल रही समीक्षा प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके आधार पर आने वाले वर्षों में AI और कॉपीराइट के बीच संतुलन बनाने वाली एक स्पष्ट और प्रभावी कानूनी नीति का निर्माण संभव हो सकेगा। यह संतुलन रचनात्मकता की रक्षा और तकनीकी नवाचार दोनों के लिए आवश्यक है।
भारत का कॉपीराइट अधिनियम, 1957 पारंपरिक रचनात्मक कार्यों की रक्षा करता है, जैसे कि साहित्य, संगीत, कला, चलचित्र आदि। इस अधिनियम में अभी तक AI या मशीन लर्निंग से संबंधित कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। यह स्थिति कानूनी अस्पष्टता पैदा करती है—क्या AI द्वारा उपयोग की गई सामग्री केवल "उपयोग" है या यह "उल्लंघन" की श्रेणी में आती है?
धारा 52 (Section 52), जो कुछ विशेष परिस्थितियों में "उचित उपयोग" (Fair Dealing) की छूट देती है, उसमें AI प्रशिक्षण जैसी तकनीकी प्रक्रिया को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। उदाहरणस्वरूप, यदि कोई मशीन किसी लेख को डेटा के रूप में उपयोग करती है, लेकिन उसे दोहराती नहीं है या उसका व्यवसायिक लाभ नहीं लेती, तो क्या वह "उचित उपयोग" कहलाएगा?
हालांकि
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अब तक सीधे तौर पर एआई और कॉपीराइट से संबंधित कोई निर्णय
नहीं दिया है, लेकिन कुछ प्रमुख मामलों में न्यायालय ने कॉपीराइट की मूल अवधारणाओं—जैसे
"रचनात्मकता", "मौलिकता", "बौद्धिक संपदा" और
"उचित उपयोग"—को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है, जो आज एआई से संबंधित कानूनी
मुद्दों पर भी लागू हो सकते हैं।
Eastern
Book Company बनाम D.B. Modak (2008) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि किसी
भी रचना को कॉपीराइट सुरक्षा तब ही मिल सकती है जब उसमें पर्याप्त "मूलता"
(originality) हो। इस फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल यांत्रिक या मशीन द्वारा
की गई रचना कॉपीराइट के योग्य नहीं मानी जाएगी जब तक उसमें मानवीय रचनात्मक योगदान
न हो। यह विचार एआई-निर्मित कंटेंट के कानूनी मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हो सकता है,
जहां यह देखना होगा कि किसी रचना में मानव योगदान कितना है।
R.G.
Anand बनाम Delux Films (1978) में न्यायालय ने यह अंतर स्पष्ट किया कि "विचार"
और "अभिव्यक्ति" दो अलग अवधारणाएँ हैं। विचारों की नकल पर कॉपीराइट लागू
नहीं होता, लेकिन किसी विचार की अभिव्यक्ति की हूबहू या अत्यधिक समान नकल कॉपीराइट
का उल्लंघन मानी जाती है। यह निर्णय आज AI के परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक है क्योंकि
यदि कोई एआई मॉडल किसी मौलिक रचना को बहुत हद तक दोहराता है, तो उसे अभिव्यक्ति की
नकल माना जा सकता है और यह कॉपीराइट उल्लंघन के दायरे में आएगा।
Indian
Performing Right Society बनाम Sanjay Dalia (2015) में सुप्रीम कोर्ट ने कॉपीराइट
धारकों के अधिकारों को सशक्त करते हुए यह रेखांकित किया कि कॉपीराइट केवल एक तकनीकी
अधिकार नहीं है, बल्कि यह एक मौलिक बौद्धिक संपदा अधिकार है, जिसे न्यायिक संरक्षण
मिलना चाहिए। यह दृष्टिकोण इस बात पर बल देता है कि किसी भी तकनीकी नवाचार—चाहे वह
एआई हो या अन्य—को रचनाकारों के अधिकारों के साथ संतुलन बिठाकर ही आगे बढ़ाया जाना
चाहिए।
इन निर्णयों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि भविष्य में जब एआई और कॉपीराइट से जुड़े मामले भारत के न्यायालयों के समक्ष आएंगे, तो उपरोक्त निर्णयों की विचारधारा और सिद्धांत मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकते हैं।
अमेरिका और यूरोप में
AI कंपनियों के खिलाफ कई
मुकदमे चल रहे हैं।
OpenAI, Meta और Google
जैसी कंपनियों पर आरोप है
कि उन्होंने बिना अनुमति लेखकों,
कलाकारों और प्रकाशकों की
सामग्री का उपयोग कर
अपने मॉडल को प्रशिक्षित
किया है। इन्हीं घटनाक्रमों
को ध्यान में रखते हुए
भारत सरकार ने एक उच्च-स्तरीय अंतर-मंत्रालयी पैनल का गठन किया
है जो यह मूल्यांकन
करेगा कि भारत के
कॉपीराइट कानूनों में किन तकनीकी
और कानूनी बदलावों की आवश्यकता है।
AI और
कॉपीराइट के बीच टकराव
अब केवल भारत तक
सीमित नहीं है, बल्कि
यह एक अंतरराष्ट्रीय कानूनी
और नैतिक बहस का विषय
बन चुका है। दुनिया
के अनेक देशों में
लेखक, प्रकाशक, कलाकार और टेक कंपनियाँ
आमने-सामने खड़ी हैं, खासकर
जब AI कंपनियाँ – जैसे OpenAI, Google, Meta और Stability AI – जनरेटिव AI मॉडल्स को प्रशिक्षित करने
के लिए इंटरनेट से
बड़ी मात्रा में डेटा एकत्र
करती हैं। इस डेटा
में अनेक बार कॉपीराइट-युक्त सामग्री भी होती है,
जिसके बिना अनुमति उपयोग
से विवाद उत्पन्न हो रहा है।
संयुक्त
राज्य अमेरिका में AI और कॉपीराइट को
लेकर कई हाई-प्रोफाइल
मुकदमे दर्ज किए जा
चुके हैं। उदाहरण के
लिए, 2023 में The New York Times
ने OpenAI और Microsoft के विरुद्ध मुकदमा
दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया
कि उनकी लेख सामग्री
का उपयोग GPT मॉडल को प्रशिक्षण
देने में हुआ। इसी
तरह, लेखक Sarah Silverman सहित कई अन्य
लेखकों ने Meta और OpenAI के विरुद्ध दावा
किया कि उनकी पुस्तकों
को बिना अनुमति स्क्रैप
कर प्रशिक्षण डेटा के रूप
में इस्तेमाल किया गया। इस
संदर्भ में यू.एस.
कॉपीराइट ऑफिस ने भी
एक सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया शुरू की है,
जिसमें यह प्रश्न उठाया
गया है कि क्या
AI आउटपुट कॉपीराइट योग्य हो सकता है,
और क्या प्रशिक्षण हेतु
कॉपीराइट सामग्री का उपयोग "फेयर
यूज़" की श्रेणी में
आता है।
यूरोपीय
संघ (EU) ने इस विषय
में अपेक्षाकृत सख्त रुख अपनाया
है। उनकी AI Act और GDPR जैसे विनियम तकनीकी
कंपनियों पर अधिक पारदर्शिता
और जवाबदेही का बोझ डालते
हैं। EU की 2019 की कॉपीराइट निर्देशिका
(Copyright Directive) यह
स्पष्ट करती है कि
टेक्स्ट और डेटा माइनिंग
के लिए कॉपीराइट धारकों
की पूर्व अनुमति आवश्यक है, विशेषकर जब
सामग्री को व्यावसायिक उद्देश्य
से इस्तेमाल किया जा रहा
हो। इस कारण यूरोप
में कई वेबसाइटों ने
AI बॉट्स को अपनी सामग्री
स्क्रैप करने से रोकने
के लिए robots.txt या कानूनी चेतावनी
जोड़ दी है।
ब्रिटेन
में पहले AI प्रशिक्षण के लिए “text and data mining” को एक सामान्य
छूट देने का प्रस्ताव
था, लेकिन रचनाकारों और प्रकाशकों की
तीव्र आपत्ति के चलते इसे
फिलहाल स्थगित कर दिया गया
है। वर्तमान में UK Intellectual Property
Office इस विषय पर नीति
समीक्षा कर रहा है
ताकि कॉपीराइट और नवाचार के
बीच संतुलन बनाया जा सके।
चीन
और जापान जैसी एशियाई शक्तियाँ
भी इस दिशा में
सक्रिय हैं। चीन ने
जनरेटिव AI के लिए दिशानिर्देश
जारी किए हैं जो
सामाजिक मूल्यों के उल्लंघन को
रोकने पर केंद्रित हैं,
जबकि जापान में अनुसंधान और
नवाचार की दृष्टि से
AI प्रशिक्षण में कॉपीराइट सामग्री
के सीमित उपयोग की अनुमति है।
इन वैश्विक घटनाक्रमों से यह स्पष्ट है कि AI और कॉपीराइट के टकराव पर कोई सार्वभौमिक समाधान नहीं है, लेकिन अधिकतर देश दो लक्ष्यों – रचनात्मक अधिकारों की रक्षा और तकनीकी विकास को बढ़ावा – के बीच संतुलन स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह इन अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीखते हुए एक स्पष्ट और सुसंगत नीति बनाए, जो एक ओर रचनाकारों के बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा करे और दूसरी ओर AI नवाचार में भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम बनाए।
भारत में AI और कॉपीराइट से
जुड़ी स्पष्ट नीति का निर्माण
अब अनिवार्य हो गया है।
इस दिशा में निम्नलिखित
कदम उपयोगी हो सकते हैं:
- कॉपीराइट अधिनियम में संशोधन – AI प्रशिक्षण और डेटा उपयोग के परिप्रेक्ष्य में “उचित उपयोग” की नई परिभाषा जोड़ी जाए।
- AI
उत्पन्न रचनाओं की कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए – क्या AI की रचना कॉपीराइट के योग्य होगी? यदि हाँ, तो मालिक कौन होगा—AI निर्माता या उपयोगकर्ता?
- लाइसेंसिंग तंत्र विकसित हो – बड़े डाटासेट और कॉपीराइटेड सामग्री के उपयोग हेतु उचित लाइसेंसिंग ढांचा तैयार किया जाए, ताकि AI प्रशिक्षण निष्पक्ष और वैधानिक हो।
- पारदर्शिता की शर्तें तय हों – AI कंपनियों को यह स्पष्ट रूप से बताना हो कि उनके मॉडल किस प्रकार के स्रोतों पर प्रशिक्षित हुए हैं।
AI और कॉपीराइट के बीच का
यह टकराव आधुनिक प्रौद्योगिकी और पारंपरिक बौद्धिक
संपदा कानूनों के बीच का
टकराव है। भारत में
यह विषय अभी प्रारंभिक
चरण में है, लेकिन
जैसे-जैसे AI का उपयोग बढ़ेगा,
यह एक बड़ा कानूनी
और नैतिक प्रश्न बन जाएगा। सरकार
द्वारा गठित पैनल का
यह प्रयास स्वागत योग्य है, लेकिन इससे
जुड़े निर्णयों में संवैधानिक मूल्यों, रचनाकारों के अधिकारों और तकनीकी नवाचार—तीनों के बीच संतुलन
बनाए रखना आवश्यक होगा।
AI युग में कॉपीराइट कानून
का भविष्य इसी संतुलन पर
निर्भर करेगा।

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