सोमवार, 19 मई 2025

बिहार की राजनीति में 'द प्लुरल्स' की नई लहर – परिवर्तन की चाह या प्रयोग की राजनीति?

 बिहार की राजनीति में 'द प्लुरल्स' की नई लहर – परिवर्तन की चाह या प्रयोग की राजनीति?

बिहार की राजनीति लंबे समय से जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय दलों और वंशवाद के बीच घूमती रही है। इस पारंपरिक ढांचे में एक नया नाम, एक नई सोच और एक नई शैली के साथ प्रवेश किया—पुष्पम प्रिया चौधरी और उनकी पार्टी ‘द प्लुरल्स’। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ी पुष्पम प्रिया का यह राजनीतिक आगमन किसी क्रांति से कम नहीं था। उन्होंने न सिर्फ खुद को बिहार के मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया, बल्कि पारंपरिक दलों को खुलेआम चुनौती भी दी।

पुष्पम प्रिया चौधरी की पृष्ठभूमि उन्हें बिहार की पारंपरिक राजनीति से अलग करती है। एक शिक्षित, महिला नेतृत्व के रूप में वे खुद को 'विकासवाद' की पक्षधर बताती हैं और बिहार को 2030 तक यूरोपीय मानकों के बराबर लाने का संकल्प जताती हैं। जब 2020 में उन्होंने अखबारों में फुल-पेज विज्ञापन देकर खुद को सीएम उम्मीदवार बताया, तो बिहार की राजनीतिक गलियों में खलबली मच गई थी।

हालांकि, जमीनी सच्चाई अलग थी। 2020 के चुनाव में ‘द प्लुरल्स’ ने 47 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, मगर कोई भी सीट नहीं जीत पाए। पुष्पम प्रिया खुद बांकीपुर और बिस्फी से चुनाव लड़ीं, लेकिन दोनों जगहों पर जमानत जब्त हो गई। यह दर्शाता है कि केवल अच्छी शिक्षा, विदेशी अनुभव और नीयत से राजनीति में सफलता नहीं मिलती; जनसंपर्क, जमीनी पकड़ और स्थानीय मुद्दों की समझ उतनी ही जरूरी है।

पुष्पम प्रिया की पार्टी अब 2025 विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है। बोधगया से शुरू की गई 'महायान यात्रा' के ज़रिये उन्होंने यह संकेत दिया है कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी खत्म नहीं हुई है। उन्होंने एलान किया है कि इस बार 'द प्लुरल्स' 243 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करेगी।

यह साहसी निर्णय है, लेकिन क्या यह व्यवहारिक भी है? पार्टी का कोई ठोस संगठनात्मक ढांचा नज़र नहीं आता, न ही उनके पास कोई जनाधारित चेहरा या गठबंधन सहयोगी है। सोशल मीडिया प्रचार और भाषाई विमर्श के ज़रिये वे एक शहरी युवावर्ग को आकर्षित करने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन ग्रामीण बिहार में उनकी पकड़ अब भी बेहद कमजोर है।

बिहार की राजनीति में परिवर्तन की जरूरत निर्विवाद है। बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी मूलभूत समस्याएँ अब भी जनता को झकझोरती हैं। ऐसे में पुष्पम प्रिया जैसी नेताओं का आना स्वागत योग्य है। लेकिन परिवर्तन के लिए केवल विचार नहीं, व्यवस्था में पैठ भी जरूरी होती है। बिहार की राजनीति में सफलता के लिए जनता के दुख-दर्द को सुनना, समझना और उनके साथ खड़ा रहना अत्यंत आवश्यक है।

पुष्पम प्रिया के पत्रों और सार्वजनिक वक्तव्यों में स्पष्ट है कि वे सिर्फ सरकार की आलोचना ही नहीं करतीं, बल्कि समाधान भी प्रस्तुत करती हैं। वे खुद को नीतीश कुमार और प्रशांत किशोर जैसे चेहरों के विकल्प के रूप में पेश करती हैं। लेकिन विकल्प बनने के लिए जनता का विश्वास अर्जित करना होता है, और यह विश्वास समय, धैर्य और निरंतर जमीनी कार्य से ही प्राप्त होता है।

'द प्लुरल्स' पार्टी बिहार की राजनीति में एक प्रयोग के रूप में आई है। यह प्रयोग कितना सफल होगा, इसका फैसला जनता 2025 के चुनाव में करेगी। यह स्पष्ट है कि पुष्पम प्रिया जैसे युवा, शिक्षित और साहसी नेतृत्व की बिहार को आवश्यकता है, लेकिन उनके प्रयासों को ज़मीन पर उतारने और जनविश्वास में बदलने के लिए निरंतर सक्रियता, पारदर्शिता और जनसंपर्क की आवश्यकता है।

अगर ‘द प्लुरल्स’ पार्टी बिहार के जनमानस से जुड़ने में सफल होती है, तो यह राजनीति में एक नई शुरुआत का संकेत हो सकता है। अन्यथा, यह भी बिहार की राजनीति का एक असफल प्रयोग बनकर रह जाएगा।

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