बुधवार, 21 मई 2025

न्यायिक सेवा में तीन वर्ष की अधिवक्ता अनुभव की अनिवार्यता

न्यायिक सेवा में तीन वर्ष की अधिवक्ता अनुभव की अनिवार्यता : सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, चुनौतियाँ, विशेषज्ञों की राय और भविष्य की दिशा


सुप्रीम कोर्ट ने 20 मई 2025 को न्यायिक सेवा में नियुक्ति के नियमों में क्रांतिकारी परिवर्तन करते हुए यह निर्णय सुनाया कि अब भारत के सिविल न्यायाधीश (जूनियर डिवीजन) पद के लिए न्यूनतम तीन वर्षों का अधिवक्ता के रूप में व्यावसायिक अनुभव अनिवार्य होगा। इस फैसले ने न्यायिक प्रणाली को अधिक व्यावहारिक, संवेदनशील और अनुभवी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है।

यह निर्णय जहाँ न्यायपालिका की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में अत्यंत सकारात्मक माना जा रहा है, वहीं इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों को लेकर विविध प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। खासकर, छात्रों और प्रतियोगी अभ्यर्थियों के बीच इस फैसले को लेकर चिंताएँ भी हैं।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क और 2002 का संदर्भ
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति बी.आर. गवई, संजय करोल और संदीप मेहता शामिल थे, ने स्पष्ट कहा कि “केवल किताबी ज्ञान से कोई अच्छा न्यायाधीश नहीं बन सकता।” उन्होंने यह भी कहा कि तीन वर्षों का अनुभव “प्रैक्टिस फॉर ए पर्पस” होना चाहिए — केवल दिखावे के लिए नहीं।

यह फैसला 2002 में All India Judges' Association बनाम Union of India केस में दिए गए उस निर्णय को पलटता है, जिसमें न्यायालय ने सीधे स्नातकों को न्यायिक सेवा में नियुक्त किए जाने को स्वीकार किया था।

हालांकि, दो दशक के अनुभवों ने यह सिद्ध कर दिया कि बिना अनुभव वाले युवा न्यायिक अधिकारियों को व्यवहारिक ज्ञान की गंभीर कमी होती है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों की राय
1. प्रो. एन.आर. माधवन मेनन (विधिक शिक्षा विशेषज्ञ एवं नेशनल लॉ स्कूल बेंगलुरु के पूर्व निदेशक):
"यह निर्णय देर से आया, लेकिन सही दिशा में है। न्यायाधीश केवल कानून के जानकार नहीं, बल्कि समाज और मानव व्यवहार के गहरे समझ रखने वाले होने चाहिए — जो केवल अधिवक्ता के रूप में काम करने से आता है।"
2. जस्टिस (सेवानिवृत्त) एके पटनायक, सुप्रीम कोर्ट:
"न्यायिक सेवा में अनुभव की अनिवार्यता लंबे समय से अपेक्षित सुधार था। प्रशिक्षण संस्थानों के भरोसे व्यवहारिक समझ विकसित नहीं की जा सकती।"
3. श्रीमती रमा त्रिपाठी, वरिष्ठ अधिवक्ता, प्रयागराज उच्च न्यायालय:
"यह फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन युवा अधिवक्ताओं को आर्थिक सहारा न दिया गया तो यह न्यायिक सेवा को केवल संपन्न वर्ग तक सीमित कर देगा।"
4. डॉ. आरिफ अली, विधि शिक्षक, AMU:
"इस निर्णय से न्यायपालिका में गुणवत्तापूर्ण प्रवेश तो सुनिश्चित होगा, लेकिन विधिक शिक्षा से निकल रहे हजारों युवाओं के लिए यह निर्णय करियर में देरी और आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।"
छात्रों की आर्थिक चुनौतियाँ
प्रारंभिक वकालत में आय लगभग शून्य होती है और अधिकांश युवा अधिवक्ता वरिष्ठों के अधीन नि:शुल्क या अल्प वेतन पर काम करते हैं।
ग्रामीण या पिछड़े क्षेत्रों से आने वाले छात्रों को शहरी केंद्रों में रहना महँगा पड़ता है।
महिला छात्रों को पारिवारिक और सामाजिक दबावों के कारण लंबे समय तक आर्थिक रूप से निर्भर रहना मुश्किल होता है।
प्राइवेट लॉ कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने वाले कई छात्रों पर पहले से शिक्षा ऋण का बोझ होता है।

सुझाव और सुधार की संभावनाएँ

1. युवा अधिवक्ताओं के लिए न्यूनतम मासिक भत्ता (stipend) की सरकारी व्यवस्था।
2. वरिष्ठ अधिवक्ताओं को प्रशिक्षु वकीलों के लिए मार्गदर्शन एवं सहयोग हेतु प्रोत्साहन।
3. राज्य स्तर पर 'ज्यूडिशियल इंटर्नशिप प्रोग्राम' की शुरुआत जिसमें छात्रों को कोर्ट में अनुभव व आर्थिक सहायता दोनों मिले।
4. बार काउंसिल द्वारा ‘अनुभव सत्यापन प्रणाली’ लागू की जाए जिससे अनुभव की प्रमाणिकता सुनिश्चित हो।
5. महिला और कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए विशेष छात्रवृत्ति और आवासीय सहायता।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में मील का पत्थर है। व्यवहारिक अनुभव की अनिवार्यता से न्यायिक अधिकारियों की संवेदनशीलता, व्यावहारिक समझ और समाज से जुड़ाव बढ़ेगा। लेकिन यदि इस अनुभव को प्राप्त करने की राह में आर्थिक बाधाएँ बनी रहीं, तो न्यायपालिका से प्रतिभाशाली लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पीछे छूट सकता है।

इसलिए यह आवश्यक है कि राज्य सरकारें, बार काउंसिल्स और न्यायिक प्रशिक्षण संस्थान मिलकर ऐसी नीतियाँ बनाएं जो इस फैसले को न केवल प्रभावी बल्कि समावेशी भी बनाएं — ताकि न्याय का मंदिर हर वर्ग के लिए खुला रहे।



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