रविवार, 24 मई 2020

तारीफ खूब हो रही है, पर इससे पेट नहीं भरता
प्रियंका कुमारी अपने पिता के साथ (फोटो स्त्रोत गूगल)


"तारीफ खूब हो रही है, पर इससे पेट नहीं भरता" यह शब्द प्रियंका कुमारी का जिसने अपने पिता को गरुग्राम से साइकिल चला कर 1200 किलोमीटर दरभंगा ले कर आयी। कई हिंदी अखबार में प्रियंका की कहानी को प्रमुखता से स्थान दिया है। सोशल मीडिया टीवी पर भी प्रियंका की चर्चा हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुत्री इवांका ट्रंप के ट्वीट के बाद तो ट्वीटर पर प्रियंका ट्रेंड करने लगी। भारतीय राजनेताओं जिसमें सत्ताधारी दल हो या विपक्ष की दलों के नेताओं ने प्रियंका की जमकर तारीफ की।कई अखबारों ने साहसिक कदम बता कर प्रियंका के प्रसंशा में खूब शब्द खर्च किये। क्या यह प्रियंका के साहसिक कहानी है या मजबूरी ? जिन राजनेताओं के विकास और न्यू इंडिया के नाम पर गाल पर तमाचा है वे सोशल मीडिया पर शर्म  से मुँह छुपा लेना चाहिये था वो तरीफों के पुल बांध रहे हैं। सरकार के मंत्री जी उसे ब्रांड एम्बेसडर बनने की घोषणा कर रहे हैं। हद है। उसके गरीबी मजबूरी विवशता का मज़ाक बनाया जा रहा है। किसी ने प्रियंका की उस परिस्थिति विचार ही नहीं किया। क्यों उसका परिवार रोजी रोटी के लिए बाहर जाने को विवश हुआ। क्या सरकार के लिए सभी को रोजगार उपलब्ध करने का कार्य नहीं कर सकता है? प्रियंका के पिता दुर्घटना के बाद बीमार थे इलाज के लिए माँ का गहना बेचना पड़ा। कहाँ गया आयुष्मान भारत? किसके लिए है आयुष्मान भारत? जो मंत्री जी ब्रांड एंबेसडर बनाने की घोषणा कर रहे थे वे पहले वो प्रियंका के पिता का इलाज की जिम्मेदारी क्यों नहीं लिए। प्रियंका गुरुग्राम से दरभंगा आयी, उसने हरियाणा उत्तर प्रदेश बिहार तीन राज्यों से होकर यात्रा समाप्त की। तीनों राज्यों में किस दल का शासन है? रास्ते मे क्यों नहीं उसे प्रवासी मजदूरों दी जाने वाली सुविधाओं का लाभ मिला? अखबार वाले क्यों किसी की विवशता को साहस बता कर मज़ाक बना रहे है। जिम्मेदार लोगों से सवाल कीजिए।
प्रियंका को भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने ₹25000 प्रदान किया। यह उसके लिए त्वरित उपयोगी आवश्यक होगा, परतु उसके लिए आगे जीवन सात सदस्यीय परिवार के लिए काफी नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी और प्रियंका बनने का नौबत नहीं हो।

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