सोमवार, 6 अप्रैल 2020
पग से पद! शिव-राज।
25 सितम्बर 2013 को भोपाल के जम्बूरी मैदान में मेरे जीवन का पहला रैली (रैली नहीं महारैली ) थी । इसका आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन के अवसर पर था। यह रैली भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ता के लिए विशेष था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे इसकी घोषणा के बाद यह पहला रैली थी। इससे पूर्व उन्होंने हरियाणा के रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों के साथ किये थे , जिसमें रि जनरल वीके सिंह, कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर के साथ सैनिकों के साथ भारतीय जनता पार्टी का सदयस्ता ग्रहण किया था। भोपाल में यह रैली 2014 लोकसभा के साथ मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनाव जो की दिसंबर 2013 में होने वाला था , इस दोनों चुनाव के लिए संयुक्त रूप से चुनावी कार्यक्रम का औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया। एक तरफ केंद्र में 10 साल बाद फिर से सत्ता में आने के लिए भारतीय जनता पार्टी संघर्ष (संघर्ष नहीं लालायित ) कर रही थी , वाही दूसरी ओर राज्य में भारतीय जनता पार्टी 10 साल से सत्ता में रही उन्हें पुनः चुनाव जीत कर सत्ता में वापस आने का चुनौती थी। जिसे भारत के मिडिया लोकसभा चुनाव से पूर्व सेमीफानल के रूप देख रहा था , तीन बड़े राज्य मध्य प्रदेश , राजस्थान तथा छत्तीगढ़ में चुनाव हो रहे थे। चुनाव विश्लेषक 2004 के भी उदाहरण दे रहे थे जहाँ भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव पूर्व विधानसभा चुनाव से शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन लोकसभा चुनाव जो कि अति विश्वास तथा साइनिंग इण्डिया के साथ लड़ा गया था वो विफल रहा था। विधानसभा चुनाव पूर्ण रूप से शिवराज सिंह के नेतृत्व में लड़ा जा रहा था , परन्तु कार्यकर्त्ता में मोदी को लेकर भी अत्यधिक उत्साह था। दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी हर वर्ष कुछ न कुछ कार्यक्रम करते रहती है , पर यह सब में विशेष था। इस रैली में भारतीय जनता पार्टी का दावा किया 12 से 15 लाख लोग आये थे , मुझे नहीं पता कि बीजेपी ने इसकी गिनती कैसे कि अपितु जम्बूरी मैदान में एक इंच जगह खली नहीं थी। मेरे लिए भी खास था , मै भी उन युवाओं में से थे जो कि अपने आप को बीजेपी के कार्यकर्त्ता मान कर चल रहे थे जो कि सोशल मिडिया तथा अपने मित्र मण्डली में जमकर समर्थन करते थे। मेरे घर से 2 किलोमीटर पर इस रैली का आयोजन रहा था जिसमें जाने के लिए उत्सुक था। इस रैली में भारतीय जनता पार्टी के उस समय के शीर्ष नेतृत्व वहाँ वहाँ आने वाले थे। एक इच्छा यह भी थी कि सब को एक साथ देखने को मिलेगा। इस रैली में बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्णा अडवाणी , तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी , मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अरुण जेटली ,सुषमा स्वराज ,नितिन गटकरी आदि पूर्ण रूप से वरिष्ठ सदस्यों के साथ मंच भरा पड़ा था। मेरे पास बिहार के रैली के अख़बार में उल्लेखित खबर का ही अनुभव था जो कि लालू प्रसाद के नेतृत्व में महारैला का अयोजन किया जाता रहा है. पटना के गाँधी मैदान का एक अपना इतिहास है जो कि कई सफल रैली तथा आंदोलन का आयोजन करता रहा है जिसमें आपतकाल के समय जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन हो या 2005 में एन डी ए के लिए अटल बिहारी वाजपयी का चुनावी रैली हो। कहा जाता है बिहार में रैली में लोग स्वमं अपने खर्च पर तथा खाना पीना के साथ आते हैं , जिसमें यह प्रसिद्ध है कि लोग अपने साथ सत्तू और प्याज लेकर आते थे। भोपाल में रैली का स्वरूप बहुत अलग था , लोगों को लाने तथा ले जाने के लिए ट्रेन के साथ अनगिनत बस तथा छोटे गाड़ी जिसे पार्किग के लिए जिला प्रशासन पसीना पसीना हो गया। शहर में उस दिन स्कूल कॉलेज के साथ सभी प्रतिष्ठान बंद थे। राज्य भोपाल के अधिकतम प्रशासन लोग इस रैली सफल आयोजन में लगे थे। रैली में आये लोग के खाना पीने का व्यवस्था सम्बंधित जिले के विधायक या पार्टी के स्तर के प्रमुख लोगो का था जो कि रंग बिरंग के सवदिष्ट खाने का प्रबंध कर रखे थे ,पानी पीने के लिए स्वछ जल जो कि बोतल बंद तथा पानी पाऊच शीतल किया गया था। सितम्बर में गर्मी का प्रभाव रहता ही है जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में पंखा और कूलर आदि का व्यवस्था था। आधुनिक टेक्नोलॉजी से परिपूर्ण यह रैली मेरे लिए अद्भुत था. लाखों लोग मंच कि देखने में असुविधा न हो इसके लिए मैदान में 40 एल इ डी स्क्रीन जो कि अपने साइज में एक 6 फीट से कम नहीं होगा। बुजुर्ग तथा महिला कार्यकर्त्ता के बैठने के लिए कुर्सी का व्यवस्था किया गया था। आमतौर पर अत्यधिक भीड़ होने पर लोग उत्साही होकर कुर्सी तोड़फोड़ करने लगते हैं पर वहाँ इस प्रकार का दृश्य नहीं था। हाँ जिधर युवा कार्यकर्त्ता थे उसमें अत्यधिक उत्साह के आगे जाने का होड़ था , नारे से क्षेत्र गूंज रहा था। जब केंद्रीय नेतृत्व का आने का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो मैदान धूल से भर गया और नरेंद्र मोदी के नारे और अधिक तेजी से गूंजने लगा। 2013 के विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह के लिए दोहरी चुनौती भरा था एक तो व्यापम घोटाले को लेकर पुरे भारत में चर्चा था ,आरोप उनके मंत्री मंडल के सदस्य आगे बढ़ कर अब उनपे लगने लगा। परन्तु जिस प्रकार केंद्र में कांग्रेस सत्ता में रहते हुए अपने आप को चुनाव में दूर होता जा रहा था वही मध्य प्रदेश कांग्रेस 10 साल से विपक्ष में होते हुए भी अपने आप को गुटबाजी से दूर नहीं कर पाया था , जितना टुकड़ा जनता पार्टी का नहीं हुआ था उसे ज्यादा मध्य प्रदेश कांग्रेस में उस वक्त गुट थे। इस सभी असर चुनाव परिणाम पर पूर्ण रूप से दिखा 230 सदस्यीय विधानसभा में 156 सीट जीत कर शिवराज सिंह ने सत्ता पुनः वापसी कर तीसरी बार मुख्यमंत्री का शपथ लिए। वो दिन भी मुझे याद है 14 दिसंबर 2013 को जम्बूरी मैदान में शपथग्राहण समारोह हुआ था। जिसमें भारतीय जनता पार्टी के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री , उपमुख्यमंत्री , प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ,भारत के अधोयोगिक घराने के लोग , साधु संत आदि के समक्ष शपथ हुआ।
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