गुरुवार, 15 मई 2025

राष्ट्रपति बनाम सुप्रीम कोर्ट : देश में छिड़ी नई संवैधानिक बहस

 

राष्ट्रपति बनाम सुप्रीम कोर्ट
देश में छिड़ी नई संवैधानिक बहस

यह विषय भारत के संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ की ओर इशारा करता है। राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट के एक अहम फैसले पर 14 सवाल उठाना न केवल अदालती फैसलों की व्याख्या की मांग करता है, बल्कि यह संविधान के मूल ढांचे, शक्तियों के संतुलन, और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर एक व्यापक बहस को जन्म देता है।
भारत का संविधान तीन प्रमुख स्तंभोंविधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिकाके बीच संतुलन की व्यवस्था करता है। इन संस्थाओं का परस्पर सम्मान और सीमाओं का पालन ही लोकतंत्र की नींव है। हाल ही में देश में एक नई संवैधानिक बहस छिड़ गई है, जब राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय के संदर्भ में अनुच्छेद 143 के तहत राय माँगी गई है। इस प्रक्रिया में पूछे गए 14 प्रश्नों ने न्यायिक स्वतंत्रता, विधायी प्रभुत्व और नीति-निर्माण के क्षेत्र में हस्तक्षेप जैसे गंभीर मुद्दों को जन्म दिया है।

अनुच्छेद 143 भारत के राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वे किसी भी विधिक या तथ्यात्मक प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से परामर्श माँग सकते हैं, जो जनहित में अत्यंत महत्वपूर्ण हो। इसे Presidential Reference कहा जाता है। यह एक संवैधानिक संवाद की प्रक्रिया है तो अनैतिक, ही असंवैधानिकबल्कि एक सुदृढ़ लोकतंत्र की परिपक्व विशेषता।

डॉ. बी. आर. आम्बेडकर ने कहा था:
यह शक्ति राष्ट्रपति को न्यायिक संस्थान से विधिक सहायता प्राप्त करने हेतु दी गई है, जिससे शासन प्रणाली में अस्पष्टता दूर हो सके।

भारतीय संवैधानिक इतिहास में कई अवसर आए हैं जब राष्ट्रपति ने अनुच्छेद 143 के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट से महत्वपूर्ण मामलों पर राय मांगी। वर्ष 1951 में दिल्ली भूमि सुधार कानून की वैधता को लेकर अदालत से परामर्श लिया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट राय दी। 1971 में बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने जैसे मामलों में राष्ट्रपति को विधिक पुष्टि प्राप्त हुई। वहीं, 1993 में राम जन्मभूमि विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि मामला न्यायिक निर्णय का विषय है, कि परामर्श का। 1998 में झारखंड विधानसभा में बहुमत परीक्षण को लेकर कोर्ट ने संविधान सम्मत मार्गदर्शन प्रदान किया। 2004 में चुनाव आयोग के अधिकारों पर परामर्श मांगे जाने पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तीनों चुनाव आयुक्त समान रूप से शक्तिशाली हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि राष्ट्रपति द्वारा न्यायालय से राय लेना एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन कोर्ट की प्रतिक्रिया हर मामले की प्रकृति पर निर्भर करती है।

राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सवाल पूछना असंवैधानिक नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत पूरी तरह से वैध और संवैधानिक प्रक्रिया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि यदि किसी कानूनी या सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट की राय लेना आवश्यक प्रतीत हो, तो वे उसे न्यायालय के विचारार्थ भेज सकते हैं। इसे "प्रेसिडेंशियल रेफरेंस" कहा जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य न्यायपालिका से मार्गदर्शन प्राप्त कर संवैधानिक व्यवस्था को बेहतर ढंग से समझना और पालन करना है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट पर यह बाध्यता नहीं है कि वह हर बार उत्तर देवह अपने विवेक से यह तय कर सकता है कि राय देनी है या नहीं, जैसा कि 1993 में राम जन्मभूमि विवाद के मामले में देखा गया। अतः राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सवाल पूछना संविधान सम्मत कार्य है और यह संस्थाओं के बीच स्वस्थ संवैधानिक संवाद का प्रतीक भी माना जाता है।

राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सवाल पूछने की प्रक्रिया लोकतंत्र की अवधारणा को कमजोर नहीं करती, बल्कि यह लोकतंत्र की मजबूती और संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन का प्रतीक है। भारतीय लोकतंत्र में तीन प्रमुख स्तंभकार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिकाअपने-अपने दायरे में स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे के संतुलन और नियंत्रण का काम करते हैं। जब राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट से संवैधानिक या कानूनी मामलों में राय मांगते हैं, तो यह शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के अनुरूप एक संवाद और मार्गदर्शन की प्रक्रिया होती है, कि किसी एक संस्था की अधीनता या दबाव। इससे यह सुनिश्चित होता है कि कोई भी निर्णय संविधान के दायरे में हो और नागरिकों के अधिकार सुरक्षित रहें। यदि यह संवाद और न्यायिक समीक्षा हो, तो लोकतंत्र अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायसंगत बनता है। इसलिए, यह प्रक्रिया लोकतंत्र को कमजोर करने के बजाय उसे मजबूत करने में सहायक है।

संविधान सभा की बहसों में अनुच्छेद 143 (जब इसे ड्राफ्ट में Article 119 कहा जाता था) पर गहरी और व्यापक चर्चा हुई थी। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इसे राष्ट्रपति को विधिक सहायता के लिए सर्वोच्च न्यायालय से संपर्क करने का अधिकार बताया, जो संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत करता है। वहीं, टी.टी. कृष्णमाचारी ने इसे इंग्लैंड के हाउस ऑफ लॉर्ड्स जैसी भूमिका से तुलना की, जहां उच्चतम न्यायालय से सलाह लेना संभव होता है। हालांकि, के.टी. शाह ने इस प्रावधान के दुरुपयोग की चिंता जताई और कहा कि इससे न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव बन सकता है। इन बहसों से यह स्पष्ट होता है कि अनुच्छेद 143 को संविधान निर्माताओं ने सोच-समझकर शामिल किया था, जिसमें इसकी उपयोगिता के साथ-साथ इसकी सीमाओं और मर्यादाओं का भी विशेष ध्यान रखा गया था ताकि इसका सही और संतुलित उपयोग हो सके।

वर्तमान विवाद एक संवैधानिक परीक्षा का रूप ले चुका है, जिसमें राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से मांगे गए परामर्श को लेकर देश दो प्रमुख दृष्टिकोणों में बँटा हुआ है। एक पक्ष इसे लोकतंत्र के भीतर संस्थागत संवाद और निर्णयों में स्पष्टता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक मानता है, क्योंकि इससे विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलन और समझ बढ़ती है। वहीं, दूसरा पक्ष इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर एक परोक्ष आक्रमण और कार्यपालिका द्वारा अपनी शक्ति का परीक्षण करने का प्रयास समझता है, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस चुनौतीपूर्ण दौर में सुप्रीम कोर्ट को केवल कानूनी विवेक का परिचय देना है, बल्कि संवैधानिक संतुलन और लोकतांत्रिक मर्यादा को भी ध्यान में रखते हुए अपने उत्तरों का निर्धारण करना होगा, ताकि भारत का लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था मजबूत बनी रहे।

भारत के लोकतंत्र की शक्ति उसकी संस्थाओं की परिपक्वता में है। राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ही इस प्रणाली के ऐसे स्तंभ हैं, जिनके बीच संवाद आवश्यक है, लेकिन संघर्ष नहीं। अनुच्छेद 143 एक संवैधानिक संवाद का माध्यम हैइसे संवाद ही रहना चाहिए, टकराव का मंच नहीं।

यदि यह प्रक्रिया विधिक स्पष्टता के लिए अपनाई जाती है तो यह सराहनीय है, पर यदि इसका उद्देश्य अदालत के निर्णयों पर दबाव बनाना या न्यायपालिका की भूमिका को सीमित करना हो, तो यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है।

संवैधानिक मर्यादा, संस्थागत गरिमा और लोकतांत्रिक संवादइन तीनों के संतुलन से ही भारत का लोकतंत्र सुरक्षित और मजबूत रह सकता है

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