दिल्ली की BJP सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से वापस ली AAP सरकार द्वारा दायर की गई याचिका
दिल्ली की भारतीय जनता पार्टी (BJP) नेतृत्व वाली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से उस याचिका को वापस लेने की अनुमति मांगी है जो आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। यह याचिका NGT द्वारा दिल्ली के उपराज्यपाल को "ठोस कचरा निगरानी समिति" (Solid Waste Monitoring Committee) का अध्यक्ष नियुक्त करने के खिलाफ थी।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ के समक्ष रखा गया, जहाँ अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने जानकारी दी कि दिल्ली सरकार अब इस संबंध में दायर कुल सात मामलों को वापस लेना चाहती है। इन मामलों में एक अध्यादेश, एक अधिनियम और विभिन्न समितियों में उपराज्यपाल की अध्यक्षता से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।
NGT ने 16 फरवरी 2023 को पारित आदेश में दिल्ली के उपराज्यपाल को ठोस कचरा निगरानी समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था, यह कहते हुए कि सुप्रीम कोर्ट और ट्रिब्यूनल द्वारा वर्षों की निगरानी के बावजूद ठोस कचरा प्रबंधन की समस्या का समाधान नहीं हुआ है। इसलिए अब इस विषय की निगरानी दिल्ली के प्रशासनिक शीर्ष स्तर द्वारा होनी चाहिए।
समिति में दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव (संयोजक), शहरी विकास, वन एवं पर्यावरण, कृषि और वित्त विभाग के सचिव, डीडीए के उपाध्यक्ष, केंद्रीय मंत्रालयों के उच्च अधिकारी, CPCB अध्यक्ष, नगर निगम आयुक्त और संबंधित जिलों के डीएम व डीसीपी शामिल थे।
पूर्व AAP सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा था कि यह संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 239AA और 12वीं अनुसूची के तहत "जनस्वास्थ्य, स्वच्छता और ठोस कचरा प्रबंधन" स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है, और इन पर निर्णय लेने का अधिकार चुनी हुई राज्य सरकार के पास है, न कि उपराज्यपाल के पास जो केवल एक नाममात्र संवैधानिक प्रमुख होते हैं।
दिल्ली सरकार ने यह भी कहा था कि NGT के निर्देशों के तहत की जाने वाली सभी गतिविधियाँ—जैसे कचरा निपटान संयंत्र स्थापित करना, मौजूदा सुविधाओं को बेहतर बनाना और पुराने कचरे की सफाई— के लिए बजटीय प्रावधान आवश्यक हैं, जिन्हें केवल निर्वाचित सरकार द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है।
नई दिल्ली सरकार द्वारा याचिका वापस लेने का कारण स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि राजनीतिक समीकरण बदलने के बाद BJP नेतृत्व वाली सरकार अब इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती। इससे संकेत मिलता है कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों की लड़ाई एक नए मोड़ पर आ गई है।
अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट कल जब इन सातों मामलों को सूचीबद्ध करेगा तो क्या सभी याचिकाओं को बिना सुनवाई के वापस लेने की अनुमति दी जाएगी या अदालत कुछ टिप्पणियाँ करेगी।

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