हाल के महीनों में बिहार और गोवा से जो घटनाएँ सामने आईं, वे केवल स्थानीय विवाद नहीं बल्कि भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की गहरी खामियों को उजागर करती हैं। अस्पताल, जो मूलतः जीवन रक्षक संस्थान हैं, अब राजनीतिक हस्तक्षेप, असहिष्णुता और प्रशासनिक अक्षमता के चलते संघर्ष के अखाड़े में बदलते जा रहे हैं। इन घटनाओं से न केवल चिकित्सकों की सुरक्षा और गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि मरीजों के मौलिक अधिकार—जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार—को भी प्रत्यक्ष हानि पहुँचती है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित किया गया है।
बिहार में हालात विशेष रूप से गंभीर रहे। 1 अगस्त 2025 को पटना एम्स में शिवहर के विधायक चेतन आनंद और उनकी पत्नी डॉ. आरुषि सिंह पर रेजिडेंट डॉक्टरों और सुरक्षा गार्डों से मारपीट और दुर्व्यवहार का आरोप लगा। घटना के बाद डॉक्टरों ने हड़ताल कर दी और अस्पताल की ओपीडी व आपात सेवाएँ ठप हो गईं। जुलाई 2025 में पटना मेडिकल कॉलेज (PMCH) में यूट्यूबर और पूर्व बीजेपी नेता मनीष कश्यप के साथ मारपीट की घटना ने भी बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े किए। मनीष ने इस घटना को लेकर पार्टी से इस्तीफा दिया और स्वास्थ्य विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार पर खुलकर हमला बोला। इसके पहले जून 2025 में उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक बच्ची की मौत को लेकर स्वास्थ्य मंत्री पर गंभीर आरोप लगाए। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि बिहार में स्वास्थ्य सेवाएँ राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रशासनिक लापरवाही से जूझ रही हैं।
गोवा में भी हालात बेहतर नहीं रहे। 7 जून 2025 को गोवा मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में स्वास्थ्य मंत्री विश्वजीत राणे ने निरीक्षण के दौरान मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रुद्रेश कुट्टीकर को सार्वजनिक रूप से फटकार लगाई और निलंबित करने का आदेश दे दिया। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद भारी विरोध हुआ। भारतीय चिकित्सा संघ (IMA) और विपक्षी दलों ने इसे अधिकार का दुरुपयोग और चिकित्सकों का अपमान करार दिया। बाद में मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से निलंबन वापस लिया गया और मंत्री ने सोशल मीडिया पर माफी मांगी, लेकिन डॉक्टरों ने इसे “स्टूडियो माफी” बताते हुए सार्वजनिक क्षमायाचना की मांग की। इस घटना ने VIP कल्चर और राजनीतिक दबाव की समस्या को उजागर कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ और निर्देश दिए हैं। कोलकाता में 2024 में हुई एक चिकित्सक की हत्या और बलात्कार की घटना के बाद कोर्ट ने अस्पतालों में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय टास्क फोर्स गठित की थी और CCTV, महिला स्टाफ के लिए अलग सुविधाएँ तथा सुरक्षा ऑडिट जैसे उपाय सुझाए थे। न्यायालय ने यह भी कहा कि डॉक्टरों की लंबी हड़ताल से जनता के जीवन के अधिकार का उल्लंघन होता है और “न्याय और चिकित्सा” दोनों ही अनिश्चितकालीन हड़ताल का सहारा नहीं ले सकते। साथ ही, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि डॉक्टरों के खिलाफ निराधार आपराधिक मुकदमों से उन्हें सुरक्षा मिलनी चाहिए, जैसा कि Jacob Mathew बनाम पंजाब राज्य और Dr. Suresh Gupta बनाम दिल्ली राज्य के फैसलों में कहा गया।
इन घटनाओं का प्रभाव व्यापक है। हड़ताल और विरोध से अस्पतालों की सेवाएँ बाधित होती हैं और मरीजों को सबसे अधिक नुकसान झेलना पड़ता है। डॉक्टरों का मनोबल गिरता है, जिससे वे भय और असुरक्षा के वातावरण में काम करने को मजबूर होते हैं। जनता और डॉक्टरों के बीच विश्वास का क्षरण होता है, और राजनीतिक दल इन घटनाओं को चुनावी हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगते हैं।
इस समस्या के समाधान के लिए विधिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अस्पतालों में Medical Protection Act का सख्ती से पालन हो, CCTV और सुरक्षा व्यवस्था अनिवार्य बनाई जाए और हिंसा की हर घटना पर छह घंटे के भीतर FIR दर्ज हो। VIP संस्कृति को समाप्त करने और सभी मरीजों के लिए समान स्वास्थ्य सुविधा सुनिश्चित करने की दिशा में नीति बनाई जाए। साथ ही, डॉक्टरों और जनप्रतिनिधियों के बीच संवाद बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जाएँ।
अंततः यह कहा जा सकता है कि यदि अस्पतालों में सुरक्षा और सम्मान का वातावरण नहीं होगा तो चिकित्सा व्यवस्था पर जनता का विश्वास टूट जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और विधिक सिद्धांतों के आलोक में केंद्र और राज्य सरकारों को तत्काल कदम उठाने होंगे ताकि अस्पताल राजनीति का अखाड़ा नहीं बल्कि जनसेवा और उपचार का सुरक्षित स्थल बने।
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