सोमवार, 16 जून 2025

जब राज्य सीमाएं खींचते हैं, संविधान रोता है




100% डोमिसाइल नीति: अधिकारों, समानता के सिद्धांतों और राष्ट्रीय एकता पर एक गंभीर प्रहार

भारतीय संविधान केवल एक विधिक संहिता है, बल्कि यह भारत के प्रत्येक नागरिक के लिए समानता, गरिमा और अवसर के सिद्धांतों की गारंटी है। यह हमें राज्यों की सीमाओं में बांधकर नहीं, बल्कि एक एकीकृत राष्ट्र की संकल्पना के तहत नागरिकता प्रदान करता है। किंतु जब राज्य सरकारें तथाकथित "100% डोमिसाइल नीति" लागू करती हैं, तो यह राष्ट्र की समरसता और संविधान की आत्मा दोनों पर आघात करती है।

100% डोमिसाइल नीति का आशय यह है कि कोई राज्य अपनी सभी सरकारी सेवाओं और शैक्षणिक संस्थानों को केवल स्थानीय निवास प्रमाणपत्र (डोमिसाइल) धारकों तक सीमित कर दे। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव यह होता है कि भारत के अन्य राज्यों के योग्य, प्रतिभाशाली और परिश्रमी युवक इन अवसरों से वंचित हो जाते हैं, भले ही उनकी योग्यता राज्य के हित में हो।

यह नीति संविधान के निम्नलिखित मूल अधिकारों का सीधा उल्लंघन करती है:

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता।
  • अनुच्छेद 15(1): जन्मस्थान या जाति के आधार पर भेदभाव निषिद्ध।
  • अनुच्छेद 16(2): सार्वजनिक नियुक्तियों में समान अवसर।
  • अनुच्छेद 19(1)(g): देश के किसी भी भाग में व्यवसाय, सेवा या निवास की स्वतंत्रता।

न्यायिक दृष्टिकोण से भी, यह नीति असंवैधानिक मानी गई है। सर्वोच्च न्यायालय के कई ऐतिहासिक निर्णयों ने ऐसे क्षेत्रीय आरक्षणों को खारिज किया है:

  • प्रदीप जैन बनाम भारत संघ (1984): मूल निवास पर आधारित आरक्षण को अनुचित ठहराया गया।
  • इंद्रा साहनी केस (1992): आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% निर्धारित की गई।
  • सुनीता रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1995): केवल स्थानीय उम्मीदवारों को पूर्ण प्राथमिकता देना असंवैधानिक घोषित किया गया।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में, इस प्रकार की नीतियां केवल युवाओं के मौलिक अधिकारों का हनन हैं, बल्कि यह भारत की संघीय एकता, अंतर्जातीय समावेशन और समान नागरिकता की अवधारणा के विरुद्ध भी हैं। जब एक राज्य "स्थानीयता" की परिभाषा को इस हद तक संकीर्ण करता है कि अन्य राज्यों के नागरिकों को बाहर कर दिया जाए, तो यह संविधान की सार्वदेशिकता को ही नकारने जैसा है।

"यह नीति युवाओं को भ्रमित करने वाली, असंवैधानिक और अवसर की समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन है। यदि हर राज्य इस राह पर चला, तो भारत एक राष्ट्र नहीं, अलग-अलग बंद द्वारों का समूह बन जाएगा।"

राजनीतिक दलों की दोहरी भूमिका भी चिंता का विषय है। जब सत्ता में होते हैं तो डोमिसाइल आधारित नीतियों को बढ़ावा देते हैं, और जब विपक्ष में होते हैं तो उनका विरोध करते हैं। यह व्यवहार नीतिगत ईमानदारी की कमी को दर्शाता है और युवाओं को राजनीतिक स्वार्थ के लिए साधन की तरह इस्तेमाल करने का प्रमाण है।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, यह नीति देश में क्षेत्रीय भेदभाव, पलायन, मानसिक तनाव और युवाओं में असंतोष को बढ़ावा देती है। इससे 'भारतीयता' का भाव कमजोर होता है और "हम" बनाम "वे" की खतरनाक मानसिकता पनपती है।

समाधान की दिशा में सबसे पहला कदम यह होना चाहिए कि राज्य सरकारें डोमिसाइल की संकीर्ण परिभाषा से ऊपर उठकर रोजगार सृजन, कौशल विकास और निवेश संवर्धन पर केंद्रित नीति तैयार करें। जब अवसर बढ़ेंगे, तो उनमें हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा स्वतः संतुलित होगी और युवाओं को अधिक संभावनाएं मिलेंगी। इसके अतिरिक्त, एक राष्ट्रीय स्तर का समेकित रोजगार पोर्टल विकसित किया जाना चाहिए, जिसके माध्यम से देश के किसी भी कोने का नागरिक भारत के किसी भी भाग में अपनी योग्यता के आधार पर अवसर प्राप्त कर सके।

नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए, कि केवल निवास प्रमाणपत्र को पात्रता का आधार बनाया जाए। इससे केवल संस्थानों में श्रेष्ठ प्रतिभा का चयन सुनिश्चित होगा, बल्कि भेदभाव की संभावनाएं भी न्यूनतम रहेंगी। अंततः, यह आवश्यक है कि भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया संविधान की मूल भावनासमानता, अवसर की स्वतंत्रता, और राष्ट्रीय एकताके अनुरूप चले। किसी भी क्षेत्रीय या राजनैतिक दबाव के तहत इन मूल्यों की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यही भारत को एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करते हैं

100% डोमिसाइल नीति केवल संवैधानिक प्रावधानों का अतिक्रमण है, बल्कि यह राष्ट्र की उस आत्मा को भी चोट पहुंचाती है जो भारत को "एक देश" के रूप में परिभाषित करती है। जब राज्य सीमाएं खींचते हैं, तब केवल अवसर ही नहीं, संविधान भी रोता है

"भारतवासिता कोई प्रमाणपत्र नहींयह संविधान से प्राप्त अधिकार है।"
"संविधान हमें स्थानीय नहीं, राष्ट्रीय नागरिक बनाता हैऔर यही भारत की असली पहचान है।"

 


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