गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

लोकनायक के नायक अंतिम दौर में

 बिहार विधनसभा 2020 के परिणाम के बाद सरकार गठन की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुका है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 7वीं बार मुख्यमंत्री बन गए हैं। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। बिहार में सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री का शपथ ली। देश में गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री प्रताप सिंह राणे के बाद दूसरे स्थान पर हैं। बिहार के इस चुनाव परिणाम के मायनों में अलग है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने तीसरी बार बिहार चुनाव में स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया है, परंतु इस बार जनता दल यूनाइटेड भारतीय जनता पार्टी से कम सीटें जीत कर छोटे भाई के भूमिका में है। 

यह चुनाव परिणाम  इक्कीसवीं  शताब्दी के दूसरे दशक के बाद नई राजनीतिक गाथा लिखने जा रहा है। इस परिणाम के उपरांत सरकार का गठन की प्रक्रिया कई नई कहानी लिख रहा है।
 सन 1974-75 के आपातकाल में जेपी आंदोलन से कई छात्र नेता बिहार की मुख्यधारा की राजनीति में आये और वे अपना वर्चस्व हासिल कर लिया। आपातकाल से उभरे नेताओं में लालू प्रसाद रामविलास पासवान नीतीश कुमार सुशील कुमार मोदी शरद यादव आदि लोगों ने बिहार के राजनीति में अहम भूमिका का निर्वाहन किया है। 1990 के दशक जो लालू प्रसाद यादव का कालखंड रहा उन्होंने सामाजिक समरसता के साथ 15 वर्ष तक बिहार में शासन किया वहीं दूसरी ओर नीतीश कुमार ने सामाजिक उत्थान विकास और सुशासन के साथ 15 वर्ष तक शासन किया अब वह फिर से 5 वर्ष के लिए शपथ ले लिये हैं। इनके अलावा रामविलास पासवान इस दुनिया में नहीं रहे शरद यादव राजनीतिक परिदृश्य से लगभग बाहर हो चुके हैं उनकी पुत्री विरासत के नाम पर कांग्रेस से विधानसभा चुनाव में जनता को अपने पक्ष में नहीं कर सकी, सुशील मोदी जो कि नीतीश कुमार के साथ लगभग 13 वर्ष बिहार के उप मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया अब उनकी पार्टी उन्हें इस पद से मुक्त कर दिया है कहा जा रहा है कि अब वह केंद्र की राजनीति में कार्य करेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार घोषणा कर चुके हैं यह उनका आखिरी कार्यकाल है इस तरह से जयप्रकाश के आंदोलन से निकले नेताओं के लिए बिहार के राजनीति में लगभग अंतिम दौर में है। रामविलास पासवान लालू प्रसाद यादव ने अपने पुत्र को आगे किया शरद यादव अपनी पुत्री को अब देखना होगा कि नीतीश के बाद जनता दल यूनाइटेड में दूसरे पंक्ति में उनका कौन स्थान लेता है वही सुशील कुमार मोदी के विकल्प में भारतीय जनता पार्टी ने दूसरी पंक्ति के नेताओं का फौज खड़ा कर दिया है अब देखना दिलचस्प होगा कि जयप्रकाश नारायण के नायकों के बाद बिहार के राजनीति किस ओर करवट लेती है? 

रविवार, 24 मई 2020

तारीफ खूब हो रही है, पर इससे पेट नहीं भरता
प्रियंका कुमारी अपने पिता के साथ (फोटो स्त्रोत गूगल)


"तारीफ खूब हो रही है, पर इससे पेट नहीं भरता" यह शब्द प्रियंका कुमारी का जिसने अपने पिता को गरुग्राम से साइकिल चला कर 1200 किलोमीटर दरभंगा ले कर आयी। कई हिंदी अखबार में प्रियंका की कहानी को प्रमुखता से स्थान दिया है। सोशल मीडिया टीवी पर भी प्रियंका की चर्चा हो रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुत्री इवांका ट्रंप के ट्वीट के बाद तो ट्वीटर पर प्रियंका ट्रेंड करने लगी। भारतीय राजनेताओं जिसमें सत्ताधारी दल हो या विपक्ष की दलों के नेताओं ने प्रियंका की जमकर तारीफ की।कई अखबारों ने साहसिक कदम बता कर प्रियंका के प्रसंशा में खूब शब्द खर्च किये। क्या यह प्रियंका के साहसिक कहानी है या मजबूरी ? जिन राजनेताओं के विकास और न्यू इंडिया के नाम पर गाल पर तमाचा है वे सोशल मीडिया पर शर्म  से मुँह छुपा लेना चाहिये था वो तरीफों के पुल बांध रहे हैं। सरकार के मंत्री जी उसे ब्रांड एम्बेसडर बनने की घोषणा कर रहे हैं। हद है। उसके गरीबी मजबूरी विवशता का मज़ाक बनाया जा रहा है। किसी ने प्रियंका की उस परिस्थिति विचार ही नहीं किया। क्यों उसका परिवार रोजी रोटी के लिए बाहर जाने को विवश हुआ। क्या सरकार के लिए सभी को रोजगार उपलब्ध करने का कार्य नहीं कर सकता है? प्रियंका के पिता दुर्घटना के बाद बीमार थे इलाज के लिए माँ का गहना बेचना पड़ा। कहाँ गया आयुष्मान भारत? किसके लिए है आयुष्मान भारत? जो मंत्री जी ब्रांड एंबेसडर बनाने की घोषणा कर रहे थे वे पहले वो प्रियंका के पिता का इलाज की जिम्मेदारी क्यों नहीं लिए। प्रियंका गुरुग्राम से दरभंगा आयी, उसने हरियाणा उत्तर प्रदेश बिहार तीन राज्यों से होकर यात्रा समाप्त की। तीनों राज्यों में किस दल का शासन है? रास्ते मे क्यों नहीं उसे प्रवासी मजदूरों दी जाने वाली सुविधाओं का लाभ मिला? अखबार वाले क्यों किसी की विवशता को साहस बता कर मज़ाक बना रहे है। जिम्मेदार लोगों से सवाल कीजिए।
प्रियंका को भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा ने ₹25000 प्रदान किया। यह उसके लिए त्वरित उपयोगी आवश्यक होगा, परतु उसके लिए आगे जीवन सात सदस्यीय परिवार के लिए काफी नहीं है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी और प्रियंका बनने का नौबत नहीं हो।

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

पग से पद! शिव-राज।

25 सितम्बर 2013 को भोपाल के जम्बूरी मैदान में  मेरे जीवन का पहला रैली (रैली नहीं महारैली ) थी । इसका आयोजन पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन के अवसर पर था। यह रैली भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्त्ता के लिए विशेष था।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे इसकी घोषणा के बाद यह पहला रैली थी। इससे पूर्व उन्होंने हरियाणा के रेवाड़ी में पूर्व सैनिकों के साथ किये थे , जिसमें रि जनरल वीके सिंह, कर्नल राजवर्धन सिंह राठौर के साथ सैनिकों के साथ भारतीय जनता पार्टी का सदयस्ता ग्रहण किया था। भोपाल में यह रैली 2014 लोकसभा के साथ मध्य प्रदेश के विधान सभा चुनाव जो की दिसंबर 2013 में होने वाला था , इस दोनों चुनाव के लिए संयुक्त रूप से चुनावी कार्यक्रम का औपचारिक रूप से प्रारंभ किया गया। एक तरफ केंद्र में 10 साल बाद फिर से सत्ता में आने के लिए भारतीय जनता पार्टी संघर्ष (संघर्ष नहीं लालायित ) कर रही थी , वाही दूसरी ओर राज्य में भारतीय जनता पार्टी 10 साल से सत्ता में रही उन्हें पुनः चुनाव जीत कर सत्ता में वापस आने का चुनौती थी।  जिसे भारत के मिडिया लोकसभा चुनाव से पूर्व सेमीफानल के रूप देख रहा था , तीन बड़े राज्य मध्य प्रदेश , राजस्थान तथा छत्तीगढ़ में चुनाव हो रहे थे। चुनाव विश्लेषक 2004 के भी उदाहरण दे रहे थे जहाँ भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव पूर्व विधानसभा चुनाव से शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन लोकसभा चुनाव जो कि अति विश्वास तथा साइनिंग इण्डिया के साथ लड़ा गया था वो विफल रहा था।  विधानसभा चुनाव पूर्ण रूप से शिवराज सिंह के नेतृत्व में लड़ा जा रहा था , परन्तु कार्यकर्त्ता में मोदी को लेकर भी अत्यधिक उत्साह था। दीनदयाल उपाध्याय के जन्मदिन के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी हर वर्ष कुछ न कुछ कार्यक्रम करते रहती है , पर यह सब में विशेष था।  इस रैली में भारतीय जनता पार्टी का दावा किया 12 से 15 लाख लोग आये थे , मुझे नहीं पता कि बीजेपी ने इसकी गिनती कैसे कि अपितु जम्बूरी मैदान में एक इंच जगह खली नहीं थी। मेरे लिए भी खास था , मै भी उन युवाओं  में से थे जो कि अपने आप को बीजेपी के कार्यकर्त्ता मान कर चल रहे थे जो कि सोशल मिडिया तथा अपने मित्र मण्डली में जमकर समर्थन करते थे। मेरे घर से 2 किलोमीटर पर इस रैली का आयोजन रहा था जिसमें जाने के लिए उत्सुक था।  इस रैली में भारतीय जनता पार्टी के उस समय के शीर्ष नेतृत्व वहाँ वहाँ आने वाले थे। एक इच्छा यह भी थी कि सब को एक साथ देखने को मिलेगा। इस रैली में बीजेपी के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्णा अडवाणी , तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी , मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अरुण जेटली ,सुषमा स्वराज ,नितिन गटकरी आदि पूर्ण रूप से वरिष्ठ सदस्यों के साथ मंच भरा पड़ा था। मेरे पास बिहार के रैली के अख़बार में उल्लेखित खबर का ही अनुभव था जो कि लालू प्रसाद के नेतृत्व में महारैला का अयोजन किया जाता रहा है. पटना के गाँधी मैदान का एक अपना इतिहास है जो कि कई सफल रैली तथा आंदोलन का आयोजन करता रहा है जिसमें आपतकाल के समय जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन हो या 2005 में एन डी ए के लिए अटल बिहारी वाजपयी का चुनावी रैली हो। कहा जाता है बिहार में रैली में लोग स्वमं अपने खर्च पर तथा खाना पीना के साथ आते हैं , जिसमें यह प्रसिद्ध है कि लोग अपने साथ सत्तू और प्याज लेकर आते थे।  भोपाल में रैली का स्वरूप बहुत अलग था , लोगों को लाने तथा ले जाने के लिए ट्रेन के साथ अनगिनत बस तथा छोटे गाड़ी जिसे पार्किग के लिए जिला प्रशासन पसीना पसीना हो गया। शहर में उस दिन स्कूल कॉलेज के साथ सभी प्रतिष्ठान बंद थे। राज्य भोपाल के अधिकतम प्रशासन लोग इस रैली सफल आयोजन में लगे थे। रैली में आये लोग के खाना पीने का व्यवस्था सम्बंधित जिले के विधायक या पार्टी के स्तर के प्रमुख लोगो का था जो कि रंग बिरंग के सवदिष्ट खाने का प्रबंध कर रखे थे ,पानी पीने के लिए स्वछ जल जो कि बोतल बंद तथा पानी पाऊच शीतल किया गया था।  सितम्बर में गर्मी का प्रभाव रहता ही है जिसके लिए पर्याप्त मात्रा में पंखा और कूलर आदि का व्यवस्था था।  आधुनिक टेक्नोलॉजी से परिपूर्ण यह रैली मेरे लिए अद्भुत था. लाखों लोग मंच कि देखने में असुविधा न हो इसके लिए मैदान में 40 एल इ डी स्क्रीन जो कि अपने साइज में एक 6 फीट से कम नहीं होगा।  बुजुर्ग तथा महिला कार्यकर्त्ता के बैठने के लिए कुर्सी का व्यवस्था किया गया था। आमतौर पर अत्यधिक भीड़ होने पर लोग उत्साही होकर कुर्सी तोड़फोड़ करने लगते हैं पर वहाँ इस प्रकार का दृश्य  नहीं था। हाँ जिधर युवा कार्यकर्त्ता थे उसमें अत्यधिक उत्साह के आगे जाने का होड़ था , नारे से क्षेत्र गूंज रहा था। जब केंद्रीय नेतृत्व का आने का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो मैदान धूल से भर गया और नरेंद्र मोदी के नारे और अधिक तेजी से गूंजने लगा। 2013 के विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह के लिए दोहरी चुनौती भरा था एक तो व्यापम घोटाले को लेकर पुरे भारत में चर्चा था ,आरोप उनके मंत्री मंडल के सदस्य आगे बढ़ कर अब उनपे लगने लगा। परन्तु जिस प्रकार केंद्र में कांग्रेस सत्ता में रहते हुए अपने आप को चुनाव में दूर होता जा रहा था वही मध्य प्रदेश कांग्रेस 10 साल से विपक्ष में होते हुए भी अपने आप को गुटबाजी से दूर नहीं कर पाया था , जितना टुकड़ा जनता पार्टी का नहीं हुआ था उसे ज्यादा मध्य प्रदेश कांग्रेस में उस वक्त गुट थे। इस सभी असर चुनाव परिणाम पर पूर्ण रूप से दिखा 230 सदस्यीय विधानसभा में 156 सीट जीत कर शिवराज सिंह ने सत्ता पुनः वापसी कर तीसरी बार मुख्यमंत्री का शपथ लिए। वो दिन भी मुझे याद है 14 दिसंबर 2013 को जम्बूरी मैदान में शपथग्राहण समारोह हुआ था। जिसमें भारतीय जनता पार्टी के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री , उपमुख्यमंत्री , प्रदेश भाजपा अध्यक्ष ,भारत के अधोयोगिक घराने के लोग , साधु संत आदि के समक्ष शपथ हुआ।