इश्क़
का महीना बस फ़रवरी है,
नाकाम आशिक़ों को हड़बड़ी है
।
सलीक़ा
ही आता तो तरीक़ा
करता, इश्क़ में ग़ालिब इक़बाल
न पढ़ता ।
हम क्यों मनाते हैं वेलेंटाइन? हमारा
इससे क्या वास्ता? हमें
इससे क्या लेना-देना?
न तो यह हमारी
संस्कृति में है और
न ही हमारे देश
में कभी इस दिवस
का प्रचलन था। फिर क्यों
कर हम इसे मनाएँ।
ज्यादातर
मौकों के रूप में
वे वेलेंटाइन दिवस के कैथोलिक
चर्च में जन्म लिया
है. दिन भी वैलेंटाइन्स
दिवस कहा जाता है.
वेलेंटाइन एक कैथोलिक संत
है. वैलेन्टिन बारे में कई
मिथकों हैं, लेकिन एक
अधिक प्रसिद्ध है: वेलेंटाइन एक
ईसाई पुजारी, जो 200 में रोम में
रहते थे. वह एक
साधु और इटली में
बिशप टर्नी था. तो यह
Interamne बुलाया गया था. वह
बगीचे में फूलों को
लेने और उन्हें युवा
प्रेमियों के लिए देने
के लिए इस्तेमाल किया.
यही कारण है कि
वे आम तौर पर
इस दिन पर एक
दूसरे को फूल दे.
इस समय में सम्राट
क्लोडिअस द्वितीय के एक कानून
था, युवा जोड़े शादी
करने के लिए नहीं
था. प्रतिबंध लगाने के लिए कारण
था क्योंकि क्लोडिअस द्वितीय अपनी सेना में
अविवाहित सैनिकों चाहता था. उन्होंने कहा
कि वे अपनी पत्नियों,
गर्लफ्रेंड, और परिवारों को
छोड़ कई खूनी लड़ाई
में भाग लेने के
लिए नहीं करना चाहता
था. इस प्रतिबंध वैलेन्टिन
ललकारा और युवा जोड़ों
के लिए कई शादियों
officiated. इसलिए, वह कैद किया
गया था और सम्राट
माक्र्स Aurelius ने मौत की
सजा सुनाई. जब वेलेंटाइन जेल
में था कि वह
जो उसे दिया फूल
या छोड़ने के छोटे संदेश
मुझे बताया कि वे सोचा
कि वह सही काम
किया था, और वे
भी प्यार में विश्वास है
कि कई युवा लोगों
ने दौरा किया था
उसके निष्पादन का इंतजार.
फिर
भी हम इसे मनाते
हैं। हम भारतवासी हैं।
हमने दुनिया को प्यार करना
सिखाया है। इसलिए दुनिया
में अगर प्रेम के
लिए कोई दिवस मनाया
जाता है तो हम
क्यों इसे ठुकराएँ। हमने
तो हमेशा सबका आदर किया
है। इतिहास गवाह है कि
भारतवासियों ने अपने दिल
में सदा से ही
हर उस सभ्यता को
अपनाया है जो प्रेम,
अहिंसा का संदेश देती
है। हमारे देश में विश्व
के सभी प्रमुख त्योहार
मनाए जाते हैं।
हम हिन्दुस्तानी मंदिर के सामने से
निकलें या मस्जिद के
या किसी चर्च के,
श्रद्धा से अपना शीश
झुकाते ही हैं। कोई
संत हो या फकीर
या फादर, हम उन्हें आदर
की दृष्टि से देखते हैं।
हमारे पूर्वजों ने दूसरों का
आदर करना हमें सिखाया
है। हम दूसरों की
संस्कृति को बहुत जल्द
आत्मसात कर लेते हैं।
यह हमारे स्वभाव में है। हमारा
सोच हमेशा सकारात्मक रहा है। हम
भारत ही नहीं दुनिया
के सारे देशों का
आदर करते हैं।
तो फिर क्यों न
हम वेलेंटाइन डे भी मनाएँ।
मनाएँगे और जरूर मनाएँगे।
लेकिन आज के कथित
संकीर्ण सोच वाले युवाओं
ने इसे विकृत बना
दिया है। जिस प्रकार
से 31िदसंबर को कहीं-कहीं
असभ्य और अशालीन तरीके
से मनाया जाता है ठीक
उसी प्रकार वेलेंटाइन डे को कुछ
लोगों ने बना दिया
है।
पिछले
वर्ष की बात है
एक लड़की को 14 फरवरी की सुबह एक
गिफ्ट मिलता है जिसमें किसी
का नाम नहीं होता।
वह कुछ अजीब सा
रहता है। वह उसे
एक तरफ रख देती
है। लेकिन शाम को वह
गिफ्ट पहुँचाने वाला उसके घर
पहुँच जाता है और
लड़की को अपने साथ
चलने के लिए कहता
है। जब वह मना
करती है तो वह
उससे कहता है कि
आज वेलेंटाइन डे है और
तुमने मेरा गिफ्ट स्वीकार
किया है।
इसलिए
तुम्हे मेरे साथ चलना
ही होगा। यह असभ्य तरीका
ठीक नहीं है। वह
लड़की तो समझदारी से
संभल जाती है लेकिन
अनेक युवा-युवतियाँ इस
प्रणय निवेदन को अपनाकर कुछ
ऐसे कदम उठा लेते
हैं जिसके बाद में पछतावे
के सिवा कुछ नहीं
रह जाता।
होना
तो यह चाहिए कि
इस वेलेंटाइन डे की तमाम
अच्छाइयों को हम अपनी
संस्कृति में मिलाएँ और
फिर इसे मनाएँ तब
देखिए जिंदगी कितनी खुशहाल लगने लगेगी। हमारी
संस्कृति में लड़का-लड़की
अगर माता-पिता की
इच्छा के विरुद्ध शादी
करते हैं तो लोग
यही कहते हैं कि
लड़की भाग गई। उसका
यूँ जाना ऐसा लगता
है मानो उसने अनर्थ
किया हो। जबकि सच
यही है कि उसने
अनर्थ किया है।
माता-पिता जिन्होंने 20-25 साल
उसे प्यार किया वे उसे
अपने नहीं लगते उसके
आगे जो मात्र कुछ
दिनों से उसे चाहता
है। आधी उम्र माता-पिता के साथ
गुजारने के बाद बची
आधी उम्र माता-पिता
की इच्छा के विरुद्ध गुजारना
क्या उनके साथ न्याय
है। क्या उनकी इच्छा,
अपेक्षा और समाज में
उनके हैसियत के साथ खिलवाड़
करना उनके सम्मान को
अपमानित करने जैसा नहीं
है। आज मीडिया कुछ कंपनियों के
उत्पाद बेचने, उनकी पब्लिसिटी के
लिए युवा को प्रणय
निवेदन करने के तरह-तरह के प्रलोभन
देता है। टिप्स बताता
है। मोबाइल कंपनियाँ अपना कारोबार करने
के लिए तरह-तरह
की आकर्षक योजनाएँ चलाती हैं। अनेक प्रकार
के आर्टिकल्स और लुभावने उदाहरण
देकर युवा वर्ग को
आकर्षित करते हैं। युवा
इनसे भ्रमित हो जाते हैं।
इनमें लिखे प्रेमी-प्रेमियों
के किस्से इन्हें अपने लगने लगते
हैं। विभिन्न चैनल
भी अनेक प्रकार के
कार्यक्रम प्रायोजित करते हैं। केवल
अपनी दुकान चलाने के लिए ये
सब समाज का कितना
नुकसान करते हैं यह
तो केवल समझने वाला
ही समझ सकता है।