रविवार, 27 जुलाई 2014

सुशील मोदी Vs शहनवाज हुसैन

सभी जगह चर्चा का विषय बना हुआ है। नितीश कुमार अपने धुर विरोधी लालू से हाथ मिला लिये। इसका एक मात्र वजह है नरेन्द्र मोदी। नितीश कुमार अपने आप को इस लोकसभा चुनाव में साबित सेकुलर करना चाहते थे।इसके कारण भाजपा से 17 साल पुराना गठबंधन तोर दिए। लेकिन इसके कारण चुनाव में काफी नुकसान हुआ है। जो भी मुस्लिम वोट था या तो वो लालू के पक्ष में गया नहीं तो बीजेपी के पास। इसी कारण से अब दोनों साथ होने जा रहे हैं। इसका खास असर बिहार के राजनीति पर पर सकता है। जहाँ लालू जी को आपे जाती यादव पर काफी पकर है। बिहार में कुल 21% यादव हैं। जिसे नितीश को मिल जाने से काफी असर पर सकता है। इन्ही सब वजह से बीजेपी की आपसी नेतृत्व को लेकर काफी असमंजस है। एक ओर जहाँ पिछले 9 वर्ष से सुशील मोदी नेतृत्व करते आ रहे है। सरकार में वे उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं। दूसरी ओर बीजेपी में यादव के एक मात्र नेता हैं नंदकिशोर यादव । नंदकिशोर यादव को मंत्री रहते हुए अच्छे कम करने के लिए तत्कालीन मुख्यमंन्त्री नितीश कुमार ने काफी परसंसा कर चुके हैं। बीजेपी इसका इनाम भी दिया विधानसभा में विपक्ष का नेता बना दिया।
सुशील मोदी जब उपमुख्यमंत्री थे तब वे नितीश कुमार के काफी करीब तथा भरोसेमंद थे।जिसके कारण सुशील मोदी गठबंधन टूटने के बाद भी कभी नितीश कुमार पर कड़ा लाइन नहीं लिए। सुशील मोदी को आडवाणी खेमा का माना जाता है।
जो लोग नरेन्द्र मोदी के कट्टर समर्थक हैं वे नहीं चाहते कि अगला चुनाव सुशील मोदी ने अगुआई में चुनाव लड़ा जाए। एक तो उनको ऐसा नेता चाहिए जो कि नितीश के खिलाफ शक्ति से पेश आये । दूसरा नरेन्द्र मोदी का समर्थक हो।
नमो के कुछ समर्थक शहनवाज हुसैन को चाहते हैं। शाहनवाज हुसैन अभी लोकसभा चुनाव में अपना सीट तो नहीं बचा पाए परन्तु बिहार में एक मात्र मुस्लिम नेता होने के कारण उनका राजनीती के कद में कोई फर्क नहीं पड़ा। शहनवाज अटल बिहारी के कार्यकाल में मंत्री रह चुके हैं। नमो के समर्थक भी हैं। आजकल बिहार के राजनीती में काफी सक्रिय हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान रामविलास पासवान से गठबंधन करने में काफी योगदान रहा है। नमो समर्थक इनको नेता मान कर जनता को संदेश भी देना चाहते हैं कि नमो मुस्लिम विरोधी नहीं हैं और युवा चेहरा को आगे कर रहे हैं। नमो समर्थक नवादा के सांसद गिरिराज सिंह लोकसभा चुनाव से पहले ही शहनवाज को CM मेटेरियल बता चुके हैं।
अगर बीजेपी शहनवाज हुसैन को अपना नेता चुन कर अगला चुनाव लड़ती है तो यह फैसला काफी चौकाने वाला भी होगा और कही ना कही बीजेपी को लाभ भी होगा।
बिहार बीजेपी में कई नेता है जो की सुशील मोदी के अगुआई में चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं। वे लोग कही ना कही शहनवाज  का साथ देगें। यही बीजेपी के लिए अच्छा होगा।

सोमवार, 9 जून 2014

मानसिक बीमार

आज -कल कांग्रेस के नेताओं का बयान आ रहा है। कुछ लोग 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी का शब्द ले कर घेर रहें हैं। दिल्ली में पिछले सप्ताह से बिजली तथा पानी का समस्या हो रहा है। कांग्रेस तथा आम आदमी पार्टी के लोग बीजेपी को जिम्मेदार बोल रहे हैं। क्या इसका जिम्मेदार बीजेपी है? पिछले 15 साल से कांग्रेस कि सरकार थी। कुछ दिन आम आदमी पार्टी की सरकार रही है। उन्होंने क्या उपाय किये थे कि आज ये संकट आया है ? इसपर तो कोई बोलने को तैयार नहीं है। खास कर आम आदमी पार्टी वाले जब दिल्ली की गद्दी छोर कर भाग रहे थे उस समय समझ में उनको नहीं आया था। उनके कारण आज दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। दिल्ली के सरे विकास का काम ठप पड़ गया है। दिल्ली में अराजकता का माहौल बन गया है। आज केंद्र में बीजेपी कि सरकार बनना मात्र 10 दिन हुए है। जब से सरकार बनी है सब कोई बीजेपी कोस रहे हैं। कांग्रेस के लोग  अपने आप से क्यों नहीं पूछते हैं कि 15 साल दिल्ली 10 केंद्र में सरकार रही है। ऐसा क्या किया जो दिल्ली को आने वाले दिन अच्छा रहे। आज बीजेपी 10 दिन में जो फैसले लिए क्या कांग्रेस अपने 10 दिन में लिए थे ? जैसा सुशासन बीजेपी 2004 में छोर कर गई थी क्या वैसा हीं आज है ?
आज कांग्रेस के नेता मतीन अहमद बिजली संकट की वजह बीजेपी सरकार को दे रही है। कितना आरोप सही है ? एक समय के लिए मान भी ले तो उत्तर प्रदेश हरियाणा के लिए कौन है ? दिल्ली कांग्रेस के नेता हैं अरविंदर सिंह लवली। वे भी आज बीजेपी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अरविंदर सिंह उस 8 विधायक में से एक हैं जो की 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपना सीट बचा पाए। आम आदमी पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाने के लिए सब से आगे थे। आज उनको कोई नहीं पूछ रहा है।

कांग्रेस के नेताओं का बयान। 
आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने भी बीजेपी पर आरोप लगाया। किस मानसिकता को वे दिखा रहे हैं? उन्होंने ने काफी कुछ बीजेपी पर आरोप लगाया है। जब उनकी पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला तो वे भाग गए। अब दूसरों  पर सिर्फ आरोप लगाते फिर रहे हैं। कभी अपने अंदर भी झाक कर देख लेते। 49 दिन के सरकार में क्या किया इसपर भी कुछ बोल लेते तो अच्छा रहता है। उनके पार्टी के लोग कभी अपने आप को राम और शास्त्री से तुलना कर रहे थे। फिर भागने के लिए माफ़ी मांगे। अब समय आ गया है कि अपने आप में मंथन करें। अब सुचिता  कि राजनीति करें। दूसरे कि आलोचना करने से बचे। एक अच्छे तथा स्वस्थ राजनीति करें। 

गुरुवार, 8 मई 2014

तिवारी 'बाबा'

शिवानंद तिवारी 
आजकल शिवानंद तिवारी कह रहे कि मोदी ओछी राजनीति कर रहे हैं। पता नहीं शिवानंद तिवारी पूरी जिंदगी कौन सा राजनीति किये हैं ? किसके बारे में बात करे ? जब तक राजद में थे तब तक क्या किये थे ? उसके बाद जदयू में आने के बाद क्या किया ? तब - तक हमारे साथ थे। आज हम से अलग हो गये तो हम ओछी राजनीति करने लगे है। तिवारी बाबा जो राजनीति आप कर रहे हैं उसका सज़ा आपको आप के पार्टी दे दिया है। जिस लोग जो भी कुछ किया था  आज वे लोग भी आपके साथ नहीं है। अच्छा है सही रास्ता चुना है।


रविवार, 30 मार्च 2014

"मौनी बाबा"

त्यागी जी आजकल चैनल दर -दर बीजेपी तानाशाह बोल रहें हैं। बीजेपी बड़े लोगों का सम्मान नहीं करती है। मोदी तानाशाह हैं। बीजेपी में मोदी के अलावा किसी का नहीं चलता है। बीजेपी में पुराने कार्यकर्ता का कोई सम्मान नहीं होता। बीजेपी उदार पर लिये गए लोगो को टिकट दिया है। बीजेपी को लोकतंत्र ख़त्म हो गया। आप  ने तो यहाँ तक कह दिया कि जिस तरह इंदिरा गांधी ने कांग्रेस का हल किया था उसी पर कर आज बीजेपी का है।  पता नहीं और भी कितने आरोप लगते हैं। पर आप कभी नहीं अपने गिरे वान में झाक कर देखा। आपके पार्टी जदयू में जो हुआ और जो हो रहा है क्या इन सब सवाल का जवाब आपके पार्टी वाले दे सकते हैं? जदयू में कौन नहीं जनता है कि सारा कम नितीश कुमार के इशारे पर होता है ? आपके नितीश कुमार तानाशाह नहीं हैं ? क्या उनके मर्ज़ी के खिलाफ शरद यादव एक पत्ती भी हिला सकते हैं ? जहाँ तक बड़े कि सम्मान कि बात है नितीश कुमार और जदयू ने जार्ज फर्नाडीस को किस सम्मान से टिकट कट दिए थे ? सिर्फ फर्नाडीस साहब कि बात नहीं है। शिवानंद तिवारी "बाबा " का टिकट क्यों कट दिया ? एक नेता को पार्टी फोरम पर बोलने का अधिकार नहीं है ? यह तानाशाही आप को नजर नहीं आया ? 2010 के विधानसभा चुनाव में आपके सांसद (राजीव रंजन सिंह उर्फ़ लालन सिंह ? खुले आम कांग्रेस के प्रत्याशी का समर्थन कर रहे थे उस समय उनको कोई पार्टी से नहीं निकला। क्यों ?वे नितीश के खास आदमी थे ? चार राज्यसभा के  सांसद का टिकट कट दिए क्यों कि वो नितीश खेमे के नहीं थे। क्या दोष था एन के सिंह का ? कितना बड़े का सम्मान किये क्यों जय नारायण निषाद  को 90 वर्ष में पार्टी से निकल दिए गए हैं ? जदयू में नितीश के अलावा किसी का चलता है ? जदयू में कैसा लोकतंत्र है ? कार्यकर्ता पार्टी पर कुछ नहीं बोल सकते। अगर बोल दिए तो पार्टी बहार का रास्ता दिखा देती है। कहाँ गया जार्ज फर्नाडीस युग  ? 12 लोकसभा के  सांसद में आप कितने को टिकट दिए हैं ? आप ने भी तो आधे से अधिक उधर के लोगो को टिकट दिया है। दूसरे का घर फोरने में तो मजा आया था ? आप के सुशासन बाबू कहते हैं कि बीजेपी मुस्लिम का सम्मन नहीं करती है ! एक बार मुख़्तार अब्बास नक़वी कहने पर बीजेपी साबिर अली को पार्टी से निकल दिया। त्यागी जी दिन भर टीवी चैनलों पर कहते फिरते हैं कि हम गैर कॉंग्रेस्सवाद विरोध करते हैं। दूसरी तरफ आप कि पार्टी कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रही है। आप में और आम आदमी पार्टी में कितना फर्क रह गया है ? टोपी और टीका लगाने वाले सुशासन बाबू क्यों बोल रहे हैं कि मुस्लिम नेता क्यों जदयू एक के बाद एक छोर रहे हैं ? 17 साल से बीजेपी

सांप्रदायिक नहीं था।  गठबंधन से हटते ही सांप्रदायिक हो गया ? आज आप कि पार्टी सपा के साथ थर्ड फ्रंट

बना ये हैं।  सपा सांप्रदायिक नहीं है ? देश के सर्वोच्च न्यायलय  ने सपा सरकार को दोषी माना है। इस पर तो 

आपका एक भी बयान नहीं आया है ? आप और आप कि पार्टी तथा सुशासन बाबू किस प्रकार के राजनीति 
करते हैं पता नहीं ? दूसरे के घर जलाना ,फोरना दूसरे पर किचर उछाल ना दूसरे के प्रगति पर जलना ये सब तो नहीं लगता है जार्ज फर्नाडीस का पार्टी है। अब आप से क्या कहूँ आप और आप के लोग नीच किस्म की राजनीति पर उतर आये हैं। 













गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

संवेदनाओं के पंख: खूब अवसर


इश्क़ का महीना बस फ़रवरी है, नाकाम आशिक़ों को हड़बड़ी है
 सलीक़ा ही आता तो तरीक़ा करता, इश्क़ में ग़ालिब इक़बाल पढ़ता

 हम क्यों मनाते हैं वेलेंटाइन? हमारा इससे क्या वास्ता? हमें इससे क्या लेना-देना? तो यह हमारी संस्कृति में है और ही हमारे देश में कभी इस दिवस का प्रचलन था। फिर क्यों कर हम इसे मनाएँ।
ज्यादातर मौकों के रूप में वे वेलेंटाइन दिवस के कैथोलिक चर्च में जन्म लिया है. दिन भी वैलेंटाइन्स दिवस कहा जाता है. वेलेंटाइन एक कैथोलिक संत है. वैलेन्टिन बारे में कई मिथकों हैं, लेकिन एक अधिक प्रसिद्ध है: वेलेंटाइन एक ईसाई पुजारी, जो 200 में रोम में रहते थे. वह एक साधु और इटली में बिशप टर्नी था. तो यह Interamne बुलाया गया था. वह बगीचे में फूलों को लेने और उन्हें युवा प्रेमियों के लिए देने के लिए इस्तेमाल किया. यही कारण है कि वे आम तौर पर इस दिन पर एक दूसरे को फूल दे. इस समय में सम्राट क्लोडिअस द्वितीय के एक कानून था, युवा जोड़े शादी करने के लिए नहीं था. प्रतिबंध लगाने के लिए कारण था क्योंकि क्लोडिअस द्वितीय अपनी सेना में अविवाहित सैनिकों चाहता था. उन्होंने कहा कि वे अपनी पत्नियों, गर्लफ्रेंड, और परिवारों को छोड़ कई खूनी लड़ाई में भाग लेने के लिए नहीं करना चाहता था. इस प्रतिबंध वैलेन्टिन ललकारा और युवा जोड़ों के लिए कई शादियों officiated. इसलिए, वह कैद किया गया था और सम्राट माक्र्स Aurelius ने मौत की सजा सुनाई. जब वेलेंटाइन जेल में था कि वह जो उसे दिया फूल या छोड़ने के छोटे संदेश मुझे बताया कि वे सोचा कि वह सही काम किया था, और वे भी प्यार में विश्वास है कि कई युवा लोगों ने दौरा किया था उसके निष्पादन का इंतजार.
 फिर भी हम इसे मनाते हैं। हम भारतवासी हैं। हमने दुनिया को प्यार करना सिखाया है। इसलिए दुनिया में अगर प्रेम के लिए कोई दिवस मनाया जाता है तो हम क्यों इसे ठुकराएँ। हमने तो हमेशा सबका आदर किया है।इतिहास गवाह है कि भारतवासियों ने अपने दिल में सदा से ही हर उस सभ्यता को अपनाया है जो प्रेम, अहिंसा का संदेश देती है। हमारे देश में विश्व के सभी प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं।
 हम हिन्दुस्तानीमंदिर के सामने से निकलें या मस्जिद के या किसी चर्च के, श्रद्धा से अपना शीश झुकाते ही हैं। कोई संत हो या फकीर या फादर, हम उन्हें आदर की दृष्टि से देखते हैं। हमारे पूर्वजों ने दूसरों का आदर करना हमें सिखाया है। हम दूसरों की संस्कृति को बहुत जल्द आत्मसात कर लेते हैं। यह हमारे स्वभाव में है। हमारा सोच हमेशा सकारात्मक रहा है। हम भारत ही नहीं दुनिया के सारे देशों का आदर करते हैं।
 तो फिर क्यों हम वेलेंटाइन डे भी मनाएँ। मनाएँगे और जरूर मनाएँगे। लेकिन आज के कथित संकीर्ण सोच वाले युवाओं ने इसे विकृत बना दिया है। जिस प्रकार से 31‍िदसंबर को कहीं-कहीं असभ्य और अशालीन तरीके से मनाया जाता है ठीक उसी प्रकार वेलेंटाइन डे को कुछ लोगों ने बना दिया है।
 पिछले वर्ष की बात है एक लड़की को 14 फरवरी की सुबह एक गिफ्ट मिलता है जिसमें किसी का नाम नहीं होता। वह कुछ अजीब सा रहता है। वह उसे एक तरफ रख देती है। लेकिन शाम को वह गिफ्ट पहुँचाने वाला उसके घर पहुँच जाता है और लड़की को अपने साथ चलने के लिए कहता है। जब वह मना करती है तो वह उससे कहता है कि आज वेलेंटाइन डे है और तुमने मेरा गिफ्ट स्वीकार किया है।
 इसलिए तुम्हे मेरे साथ चलना ही होगा। यह असभ्य तरीका ठीक नहीं है। वह लड़की तो समझदारी से संभल जाती है लेकिन अनेक युवा-युवतियाँ इस प्रणय निवेदन को अपनाकर कुछ ऐसे कदम उठा लेते हैं जिसके बाद में पछतावे के सिवा कुछ नहीं रह जाता।
 होना तो यह चाहिए कि इस वेलेंटाइन डे की तमाम अच्छाइयों को हम अपनी संस्कृति में मिलाएँ औरफिर इसे मनाएँ तब देखिए जिंदगी कितनी खुशहाल लगने लगेगी। हमारी संस्कृति में लड़का-लड़की अगर माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध शादी करते हैं तो लोग यही कहते हैं कि लड़की भाग गई। उसका यूँ जाना ऐसा लगता है मानो उसने अनर्थ किया हो। जबकि सच यही है कि उसने अनर्थ किया है।
 माता-पिता जिन्होंने 20-25 साल उसे प्यार किया वे उसे अपने नहीं लगतेउसके आगे जो मात्र कुछ दिनों से उसे चाहता है। आधी उम्र माता-पिता के साथ गुजारने के बाद बची आधी उम्र माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध गुजारना क्या उनके साथ न्याय है। क्या उनकी इच्छा, अपेक्षा और समाज में उनके हैसियत के साथ खिलवाड़ करना उनके सम्मान को अपमानित करने जैसा नहीं है। आज मीडिया कुछ कंपनियों के उत्पाद बेचने, उनकी पब्लिसिटी के लिए युवा को प्रणय निवेदन करने के तरह-तरह के प्रलोभन देता है। टिप्स बताता है। मोबाइल कंपनियाँ अपना कारोबार करने के लिए तरह-तरह की आकर्षक योजनाएँ चलाती हैं। अनेक प्रकार के आर्टिकल्स और लुभावने उदाहरण देकर युवा वर्ग को आकर्षित करते हैं। युवा इनसे भ्रमित हो जाते हैं। इनमें लिखे प्रेमी-प्रेमियों के किस्से इन्हें अपने लगने लगते हैं। विभिन्न चैनल भी अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रायोजित करते हैं। केवल अपनी दुकान चलाने के लिए ये सब समाज का कितना नुकसान करते हैं यह तो केवल समझने वाला ही समझ सकता है।