दो साल बाद दशहरा में कही घूमने गया था। इस से पहले राजस्थान का दशहरा देखा है। वहाँ दशमी से मेला लगता है और उसके 27 दिन बाद तक रहता है। जब हम अपने स्कूल के साथियों के साथ मेल देखने गया तब के अनुभव और जब हम अपने गाँव में मेला देखने जाते थे अपने बचपन के साथियों के साथ तो कुछ खास परिवर्तन नहीं दिखा था। उस समय हम लोग को 2 से 10 रुपये तक मिलते थे। वही 10 रूपये से हम तीन दिन मेला घूमते थे। उसी पैसे से कभी चाट कभी समोसे खाने का इच्छा करता था। कभी मन करता की घड़ी या चश्मे ले लू। उस समय मेला में बच्चे के लिए ज्यादा सामान बिकते थे और बड़ो के लिए कम।
अब समय बदल गया है। इस साल हम अपने महाविद्यालय के साथी के साथ गया। हम चार लोग थे। जिसमे कि मैं दो लोग को जनता हु। अनजान लोग के साथ मेला घूमने का अलग अनुभव प्राप्त हुआ। रात 9 बजे निकले घूमने। पिछले साल दशहरा में भोपाल में ही था और इस साल भी पर दोनों साल का अनुभव अलग -अलग है। इस बार घूमने निकले तो सब साथी नया है जो कि हमे तीन महीने पहले से जनता हु। कोई खास जानकारी नहीं है उन लोगों के बारे में फिर भी निकल पड़ा घूमने। मेरे और मरे साथियों के लिए ये शहर नया है। इस शहर की ज्यादा जानकारी नहीं है। इस से पहले मैं बिहार और राजस्थान का दशहरा घूम चुका था। दोनों प्रदेश के दशहरा मनाने अपनी अपनी परंपरा के अनुसार भिन्न था। यहाँ भोपाल में तो और भी भिन्न है। मैं कम से कम 10 से ज्यादा मेलों में घूमा पर सब जगह कुछ सा मान्यता थी और कुछ भिन्यता भी थी। हम लोग सबसे पहले बिठाठ्ल मार्केट रोड नंबर 10 का पंडाल देखा वहाँ पंडाल का वेल्लूर के लक्ष्मी नारायण मंदिर के स्वरूप का बना हुआ था। जो मूर्ति वहाँ स्थापित था वह भी वेलुर से लाया गया था। मूर्ति को बनाने में कुल लगभग 25 लाख रुपये खर्च हुआ था। ( ये जानकारी वहाँ के लोगो से मिला। ) वहाँ जाने के बाद एक बहुत लंबा पंक्ति था। लोग पास लेने के लिए वहा खरे थे। हम लोग वहा से चल दिए क्योंकि अगर हम लोग पास लेना चाहते तो अगले दिन नंबर आता। हम लोग बहार से दर्शन कर के चल दिए। कुछ ही दूर पर एक छोटा सा पंडाल था वहा हम लोग रुके वहा का मूर्ति स्प्रिंग पर सेट था। सरे मूर्ति आपस में घूमते रहते थे। सब बिजली पर सेट था। इस से पहल ऐसी मूर्ति देवघर झारखंड में देखा था। उस समय पता भी नहीं चला था कि ये सब आखिर कैसे होता है। जिस पंडाल में गया था वहा कोई दो - चार लोग थे। उसके बाद हम लोग न्यू मार्केट की ओर गया। रास्ते में जब हम लोग महाराणा प्रताप नगर से गुज़र रहा था वहा सड़क पर भंडारा चल रहा था। यहा भंडारा का मतलब लोग अपनी सरधा से लोगो को मुफ्त में भोजन कराते है। उसके बाद हम लोग न्यू मार्केट पहुचे जहा कि रामेश्वरम के मंदिर जैसा पंडाल बना हुआ था। यहाँ भी लाइन में लग कर पंडाल में जाने का सिस्टम था। यहाँ एक और व्यवस्था जो 101 रुपये का दान करेगा उसे वी.ई.पी. गेट से अंदर जाने का अनुमति मिलता था। हम लोग सामान्य गेट से अंदर गया। लगभग आधे घंटे लाइन में खड़ा होने के बाद अंदर गया। मन में उत्सुकता थी कुछ खास अंदर होगा परन्तु वैसा कुछ नहीं था जो मेरे मन में आ रहा था। मन में लग रहा था कि जैसे बचपन में जो मेला में देखते उस से काफी अलग था। बचपन में मेले में मिठायाँ कि दुकान रहती थी। चाट , समोसे , और भी खाने - पीने वाली वस्तु का दुकान रहती थी। यहाँ पर वैसा कुछ नहीं था। वहाँ कुछ अलग ही देखने को मिला। पूरे पंडाल के अंदर बड़े - बड़े पोस्टर और होडिंग्स लगे हुए थे। सब पर नवरात्रि तथा दीपावली का शुभकामनाएँ दिया हुआ था। वहाँ से चलने के बाद महाराणा प्रताप नगर आये। वहा पान की दुकान पर मीठी पान खाए। फिर वहा से हम लोग पुरानी भोपाल कि ओर चल दिया। पुरानी भोपाल में सबसे से पहले हम लोग जिंसी चौराहा पहुचे यहाँ भी कोई खास बड़ा मेला नहीं था फिर भी यहा पुलिस वाले अधिक संख्या में थे। पंडाल में दोनों तरह के मुर्तिया ते , एक जो सामान्य रूप से सभी जगह रहते है , दूसरी स्प्रिंग पर सेट रहते है। पर ये सब स्चलित नहीं थे। लोगो द्वारा चलाया जाता था। यहाँ किसी प्रकार का कोई दुकान नहीं था। सिर्फ़ होडिंग्स पंडाल के चारों ओर लगा हुआ था। जिसकी कुछ तस्वीर इस प्रकार है।
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| ये हैं सार ग्रुप वाले हैं ये इस होडिंग्स के माध्यम से 2BHK और 3BKU का प्रचार कर रहे हैं। |
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| ये हैं गीता मार्बल्स वाले |
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| इनकी तस्वीर साफ नहीं आया है। पर ये भी कुछ न कुछ बेच रहे है। |
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| ये एक मात्र होडिंग्स मिला जिसमे कि ये हम लोग का आने का स्वागत किया। और ये हमे 20 दिन पहले दीपावली का शुभकामनाएँ दे दिया। |
ये सात किलो मीटर चल कर होडिंग्स लगाये हैं। और बहुत शानदार होडिंग्स था।
सुबह एक बजे एक पंडाल में गया वहा बंगाली मूर्ति बना हुआ था। सारा कर्यक्रम बंगाली में हो रहा था। उस समय लगा कि हम हिन्दी भाषी प्रदेश में नहीं हैं। वहाँ दो बच्चे का बंगाली गाने पर नृत्य मन मोह लिया। उसके बाद हम लोग मिनाल रेजीडेंसी कि ओर गया। वहाँ राज एक्सप्रेस द्वरा गरबा नृत्य का आयोजन किया गया था। वहा के लोग पारंपरिक पोशाक में गरबा कर रहे थे। यहाँ आते ही लगा की हम राजस्थान उतरी भाग तथा गुजरात आ गये हैं। सभी लोग गरबा बहुत अच्छे से कर रहे थे। मैने यहा भी कुछ तस्वीर लिया जो इस प्रकार है।
यहाँ नमकीन तथा चाट बिक रहा था। बचपन का याद आ गया था। हम लोग फुआ और चाचा के साथ मेला घूमने जाते थे। वे लोग के पैसे से चाट और समोसे खाते थे। हमारे यहाँ एक खास प्रकार की नमकीन होती थी जिसे हम लोग झल्ली कहते हैं। (बिहार में सिर्फ ) ।
इस सस्टॉल पर चना जोर गरम मिल रहा था। कुछ ऐसी भी चीजे मिल रहे थे जो की हमारे बिहार में नहीं मिलता है। पाव - भाजी बड़ा पाव। ये सब महाराष्ट्र के लोग ज्यादा भोजन के रूप में प्रयोग कर ते हैं।
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| भगवान क्रष्ण के रूप में एक छोटा बच्चा। |
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| गुजरात परम्परा की एक मूर्ति |
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| भगवन शंकर के रूप में न्रत्य कर ते हुए। |
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| राजस्थान परम्परा की एक मूर्ति |
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| केसरिया रंग में गरबा कर ते लोग। |
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| राजस्थनी वेश में। |
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| मथुरा के भगवान बलराम जी की मूर्ति |
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| भगवन बलराम के रूप में। |
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| गरबा करते लोग। |
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| तिरंगे के तीनो रंग में। |
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| उजला तथा केसरिया रंग के वेश में न्रत्य करती। |
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| पीठ पर सुप बाधें हुए जो की बुराई के दूर भगाने का प्रतीक है। |
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| गुजरती वेशभूषा में गरबा कर ते हुए। |
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| तिरंगे के भेष में न्रत्य करते लोग। |
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| भगवान क्रष्ण के भेषभूषा में |
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| ये हमारे सुरक्षा कर्मी थोड़ा दुखी लग रहे थे आज पर्व के दिन भी इनका ड्यूटी पर तैनात हैं। |
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| यहाँ भी सभी कपनी अपनी प्रचार में लोगो लगा रखा है। |
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| ये थे अन्न के देवता हल लिए हुए। |
पूरी रात घूमने के बाद लगा की हम दो - तीन प्रदेश का भ्रमण कर के आये हैं। गुजरात राजस्थान मध्य प्रदेश महाराष्ट्र का भ्रमण कर के आया हूँ। लेकिन एक चीज का कमी महसूस हुआ हमारे बिहार में मेले का मतलब होता है कि मिठाएयाँ की दुकान लगना जरूरी है पर यहा कही भी इस प्रकार की कोई दुकान नहीं दिखा। हमारे यहा कोई भी पर्व हो बिना मीठा का तो होता हे नहीं है। फिर भी घूमने में खूब मज़ा आया। ऐसा भी नहीं लगा की हम किसी नये दोस्तों के साथ घूम रहा हु। मै उन सभी साथियों को दिल से धन्यवाद देता हूँ। मैं इस प्रदेश के सभी वासी का भी आभरी हू जो की एक रहते हुए अन्य प्रदेश में होने का बोध कराया।